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बांग्लादेश में हिन्दू समुदाय बड़े चमत्कारिक ढ़ंग से विलुप्त होता जा रहा है. इतना ही नहीं यहां हिन्दुओं के गायब होने का सिलसिला अपने चरम पर पहुंचता दिखाई दे रहा है. 2011 में बांग्लादेश की जनगणना के निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करते हैं. यहां हिन्दू समुदाय को अपने अस्तित्व के खतरे के खिलाफ आवाज उठाने के लिए कोई भी मंच नहीं है. यहां उसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है. इस विदारक स्थिति से आहत होकर बांग्लादेशी हिन्दू बड़ी ख़ामोशी से , दुनिया की नज़रों से ओझल होकर धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है. इसका जो भी कारण हो पर यह एक कटु सत्य है. आंकड़ों से ज्ञात होता है कि बांग्लादेशी हिन्दुओं को अपनी आवाज उठाने के लिए कोई मंच नहीं है , संयुक्त राष्ट्र में भी नहीं. यही कारण है कि 2013 में बांग्लादेश सरकार की वेबसाइट पर जारी किए गए आंकड़ों पर किसी का ध्यान नहीं गया , जहां 2011 में बांग्लादेशी सरकार द्वारा जारी किए गए धार्मिक जनगणना का डाटा उपलब्ध है.

इस समय बांग्लादेश में हिन्दुओं की संख्या महज 8.6 प्रतिशत रह गई है. 1951 के बाद से हर दशक में हिंदुओं के प्रतिशत में गिरावट आई है. यह गिरावट बांग्लादेश के सभी जिलों में बिना किसी अपवाद के देखी जा सकती है.

बांग्लादेश में ऐसे 9 जिले हैं जहां 2001 की तुलना में हिन्दुओं की नकारात्मक वृद्धि दर दर्ज की गई है , जो कि हिन्दू आबादी में हो रहे लगातार भारी कमी को इंगित करता है.

बांग्लादेश में पहली जनगणना में (जब वह पूर्वी पाकिस्तान था) , तब वहां मुस्लिम आबादी 3 करोड़ , 22 लाख थी जबकि हिन्दुओं की जनसंख्या 92 लाख , 39,000 थी. अब 60 वर्षों के बाद हिन्दुओं की संख्या केवल 1 करोड़ , 20 लाख है , जबकि मुस्लिमों की संख्या 12 करोड़ , 62 लाख हो गई है. इससे स्पष्ट होता है कि बांग्लादेश में हिन्दू आबादी किस तरह विलुप्त होती जा रही है.

1981 में , बांग्लादेश के 7 जिलों में हिन्दुओं की संख्या में 6 प्रतिशत से अधिक गिरावट देखी गई थी. सांख्यिकी मापदंडों , जैसे जनसंख्या वृद्धि दर और जन्मदर के आधार पर कई समाजशास्त्रियों का आकलन है कि इस आधी सदी में 40 से 80 लाख हिन्दू बांग्लादेश से ‘ विलुप्त ’ हुए हैं. दीपेन भट्टाचार्य , जो कि मूलतः बांग्लादेशी हैं और जो वर्तमान में अमेरिका में बतौर वैज्ञानिक काम कर रहे हैं , उन्होंने अपने लेख “ बांग्लादेशी हिन्दुओं का सांख्यिकी भविष्य ” में कहा है कि “ इस सदी के अंत तक बांग्लादेश में हिन्दुओं की औसत संख्या 1.5 रहेगी , जबकि 2011-2051 के दौरान हिन्दू जनसंख्या वृद्धि दर - 0.64% होगा और 2051 में इसकी संख्या 1974 के बराबर हो जाएगा. ”

बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ-साथ , बौद्ध आबादी में भी भारी कमी आई है. बौद्ध समुदाय चिटगांव पहाड़ी मार्ग के तीन जिलों , - बंदरबन , खग्राछरी और रंगमती में ही सिमट कर रह गए हैं. गत तीन दशकों में जनजातीय बौद्ध लोगों की एक बड़ी संख्या को यहां से विस्थापित कर दिया गया.

हिन्दुओं के इस “ गायब ” होने के पीछे कुछ लोगों का कहना है कि रोजगार के बेहतर अवसर की तलाश में यहां के हिन्दुओं ने पलायन किया है. हालांकि यह भी सत्य है कि बांग्लादेशी मुस्लिमों का भी भारी संख्या में स्थानांतरण हुआ है और यह हिन्दुओं के अनुपात के बराबर हो सकता है , फिर भी इससे हिन्दू प्रतिशत में आई गिरावट को स्पष्ट नहीं किया जा सकता. हां , 2011 की जनगणना में इस सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण संकेत जरुर मिलते हैं.

2011 की जनगणना के अनुसार , 2001 की तुलना में बांग्लादेश में लैंगिक अनुपात लगभग 6%   घटा है. यह दर्शाता है कि यहां पहले की तुलना में इस बार 40 लाख की कमी का अंतर है ( 2001 की तुलना में पुरुषों की संख्या कम है , या फिर महिलाओं की संख्या अधिक है जिसकी संभावना कम ही है). इस अंतर के बाद यह तार्किक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि धार्मिक अनुपात में मुसलमानों की तुलना में हिंदुओं का पलायन लगभग बराबर है.

यह स्पष्ट है कि बांग्लादेश में विलुप्त होते हिन्दुओं की संख्या के पीछे अनेक कारण होने चाहिए. विभिन्न अध्ययनों और समाचार रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि वहां हिन्दुओं पर अत्याचार , धर्मान्तरण और उनकी भूमि हड़पने की घटना इसके पीछे मुख्य कारण हैं.

हिन्दुओं पर अत्याचार , सीमाओं से परे और बेहद शर्मनाक

पिछले कुछ वर्षों में यहां हिन्दुओं पर हमलों की कई घटनाएं हुईं हैं. हिन्दुओं की संपत्तियों को लूटा गया , घरों को जला दिया गया तथा मंदिरों की पवित्रता को भंग कर उसे आग के हवाले कर दिया गया. और ये हमले बेवजह किए गए. 2013 में , अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय द्वारा जमात-ए-इस्लामी के उपाध्यक्ष दिलावर हुसैन को 1971 के युद्ध अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई गई. इसकी प्रतिक्रिया में जमाते इस्लामी के समर्थकों ने हिन्दुओं पर जमकर हमले किये तथा लूटपाट की. उल्लेखनीय है कि 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ नौ महीने तक चले बांग्लादेश के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हिन्दुओं पर अत्याचार , बलात्कार और नरसंहार के आरोपों में दिलावर को दोषी पाया गया था.

2012 में , कॉक्स बाजार जिले के रामू में कट्टरपंथियों ने 22 बौद्ध मंदिरों को नष्ट कर दिया और फेसबुक के कुछ पोस्ट के खिलाफ प्रतिक्रिया के रूप में कई घरों को जला दिया गया.

बांग्लादेश के विख्यात बुद्धिजीवी अफसान चौधरी के अनुसार

“ यह बेहद शर्मनाक है कि सैंकड़ों मुल्लाओं ने जमात-ए-इस्लामी द्वारा बौद्ध मंदिरों और घरों पर किए गए हमलों का समर्थन किया , और वह इसलिए कि कटटरपंथियों ने फेसबुक पर कथित इस्लाम विरोधी तस्वीर के खिलाफ अपना विरोध जताया था. यह एक ऐसा समय रहा जो यह स्पष्ट करने के लिए काफी है कि दुनियाभर में मुसलमान अलोकप्रिय क्यों हैं ? अपने साथ दुर्व्यवहार का दावा करते हुए कट्टरपंथियों ने सामूहिक और सामाजिक बर्बरता को चरम चिखर पर पहुंचा दिया है. ”

2013 के चुनाव और उसके बाद चुनावी उन्माद में हिंदुओं को निशाना बनाया गया और बेरहमी से विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा उनपर दबाव डाला गया.

इस दौरान कई रिपोर्टें आईं जिसमें नाबालिग हिन्दू लड़कियों को जबरन शादी और धर्मान्तरण के लिए मजबूर किया गया. उदाहरणार्थ , 2013 में ढाका ट्रिब्यून में "अपहरण के बाद धर्मान्तरण के लिए मजबूर ” शीर्षक से स्टोरी चली थी जिसमें ऐसे कई मामलों का पता चलता है. 

“ पुरुषों का अपहरण , और 10 से 16 वर्ष की अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों का जबरन निकाह , और उनसे जबरदस्ती हस्ताक्षर कराया गया कि वे वयस्क हैं और वे इस्लाम कबुल करना चाहते हैं. ”

जहां इस प्रकार के हिन्दू उत्पीडन का दुष्चक्र रचा गया , उससे बचने के लिए बड़ी संख्या में हिन्दुओं ने पलायन कर लिया. बांग्लादेश के राजनीति शास्त्री और प्रोफ़ेसर अली रियाज , जो कि अब अमेरिका में रहते हैं , ने अपनी पुस्तक “ गॉड विलिंग : द पॉलिटिक्स ऑफ़ इस्लामीजम इन बांग्लादेश ” में यह निष्कर्ष निकाला है कि पिछले 25 वर्षों में बांग्लादेश से 53 लाख हिन्दू पलायन कर गए हैं.

सांप्रदायिक राजनीति का विकास : हिंदुओं! भाग जाओ!

बांग्लादेश का राजनीतिक माहौल वर्ष दर वर्ष अधिकाधिक सांप्रदायिक होता जा रहा है. 1977 में संविधान से सेक्युलरिज्म शब्द हटा दिया गया. 1988 में बांग्लादेश ने खुद को इस्लामिक देश के रूप में घोषित कर दिया गया. जमात-ए-इस्लामी की तरह इस एक दशक में कई राजनीतिक दल के उदय से यहां का माहौल बिगड़ा है. परिणामस्वरूप बांग्लादेश के 350 सदस्यीय संसद में केवल 15 हिन्दू सांसद हैं. आम तौर पर अवामी लीग अल्पसंख्यकों के लिए उदार पार्टी के रूप में जाना जाता है. आज भी संसद के 15 हिन्दू सदस्यों में से 13 सदस्य अवामी लीग से है , जबकि 2 सदस्य निर्दलीय हैं. अन्य तमाम राजनीतिक दलों में हिन्दू प्रतिनिधि की संख्या शून्य है. यहां यह ध्यान में रखना चाहिए कि बांग्लादेश के उन 9 जिलों में जहां हिन्दुओं की संख्या काफी कम है , वहां 2001 के चुनाव में गोपालगंज जिले को छोड़कर हिन्दू विरोधी कट्टर दल जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी गठबंधन ने सभी सीटें जीतीं.

शत्रु संपत्ति अधिनियम : जब सरकार ही लुटेरा बन गया

एक और कारण जो कि आसानी से समझ में नहीं आता. पिछले कई दशकों में तथाकथित शत्रु संपत्ति अधिनियम [ VPA] जैसे अनुचित प्रावधानों के पक्षपातपूर्ण कार्यान्वयन के चलते हिन्दुओं को अपनी संपत्ति गंवानी पड़ी.

ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और अर्थशास्त्री अबुल बरकत जिनका ‘ पॉलिटिकल इकॉनोमी ऑफ़ वेस्टेड प्रोपर्टी एक्ट इन रूलर बांग्लादेश ’ और ' एन इन्क्वायरी इनटू काउसेस एंड कोन्सेक़ुएन्केस ऑफ़ डेप्रिवेशन ऑफ़ हिन्दू माइनॉरिटीज इन बांग्लादेश थ्रू द वेस्टेड प्रोपर्टी एक्ट '   पर गहरा अध्ययन है. उनके अध्ययन के अनुसार , “ लगभग 12 लाख ( 43%) हिन्दू परिवारों को EPA या VPA के जरिए प्रभावित किया गया है. इस अधिनियम के तहत हिन्दू समुदाय के स्वामित्व की लगभग 20 लाख एकड़ भूमि को हड़प लिया गया , जो कि बांग्लादेश की भूमि का केवल 5% है , लेकिन यह भूमि हिन्दू समुदाय के स्वामित्व के लगभग 45% है. ”

अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि यह अधिनियम भूमि हथियाने का मात्र एक तरीका है. किसी परिवार के एक सदस्य की मृत्यु होने या पलायन करने की स्थिति में उस परिवार की सारी संपत्ति हड़पने के लिए एक बहाने के रूप में इस अधिनियम का प्रयोग किया जाता है. ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें प्रभावशाली पार्टियों , भू-माफियाओं और फर्जी दस्तावेजों का उपयोग करके हिन्दुओं के जमीन पर कब्ज़ा किया गया.

उदाहरणार्थ , 2009 में ‘ जुगांतर ’ के एक जांच से पता चला कि इस अधिनियम के तहत चिटगांव प्रशासन द्वारा विनियोजित भूमि की 30,000 एकड़ जमीन का केवल 5000 एकड़ भूमि ही सरकारी नियंत्रण में है , शेष भूमि ‘ अज्ञात तत्वों ’ के कब्जे में हैं. इस सन्दर्भ में ‘ डेली स्टार ’ समाचार रिपोर्ट का यह कथन वास्तविकता को दर्शाने के लिए विशेष उदाहरण है. समाचार रिपोर्ट के अनुसार ,

“ स्थानीय धनिकों और भूमि प्रशासकों द्वारा इस अधिनियम के तहत हिंसा और सत्ता के दुरुपयोग के कई मामले हैं. शिराजदिखा मुंशीगंज के शमरेशनाथ ने इस अधिनियम के अंतर्गत लिए गए उनकी रियासती संपत्ति की घोषणा को जब चुनौती दी , तब उस क्षेत्र के यूनियन निर्वाही ऑफिसर ने स्थानीय हिंसक गुंडों और पुलिस के द्वारा उनको और उनके परिवार को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया. उच्च न्यायालय ने 2009 में नाथ के पक्ष में फैसला सुनाया , इसके बावजूद यूनियन निर्वाही ऑफिसर ने तबतक नाथ और उनके परिवार को धमकाना बंद नहीं किया , जबतक वे अपने परिवार के साथ वहां से चले नहीं गए. नाथ आज तक अपने घर नहीं लौट सके हैं. उन्होंने कहा , “ मेरे पिता बांग्लादेश के जिला आयुक्त थे. जब उनको न्याय नहीं मिल सका , तो यहां आम लोग कहां जाएंगे ?”

बुद्ध मतावलंबियों को भी यहां ऐसी ही विदारक स्थिति से गुजरना पड़ रहा है. अबुल बरकत के अध्ययन के अनुसार , चिटगांव पहाड़ी मार्ग के तीन जिलों , - बंदरबन , खग्राछरी और रंगमती में 22% बौद्ध धर्मावलम्बियों की भूमि छीन ली गई. 1978 में बौद्धों के स्वामित्ववाली भूमि 83% थी जो कि 2009 में घटकर 41% ही रह गई है , इस कारण उन्हें मजबूरन भूमिहीन होना पड़ा.

बांग्लादेश में हिन्दुओं की लगभग आधी आबादी को अपनी भूमि से वंचित होना पड़ा है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भूमि हड़पे जाने के बाद वे वहां से पलायन कर रहे हैं.

ऐसा नहीं कि सभी बांग्लादेशी इससे खुश हैं. अफसान चौधरी ने कहा कि

“ हम कितना ही क्यों न कह लें , सिवा मायूसी के कुछ हासिल नहीं होगा. हम कभी नहीं चाहते कि ऐसा बार-बार हो , और फिर...हमें पुराने पाकिस्तान के एक नए संस्करण की जरूरत पड़े. हम ऐसा देश बनाने में असफल हो गए जिसपर हम गर्व कर सकें. हालांकि बांग्लादेश पूर्व पाकिस्तान से बिल्कुल विपरीत है , तथापि बांग्लादेश में अक्षमता , भ्रष्टाचार , कट्टरता और धार्मिक भेदभाव के चलते वह अच्छा देश नहीं बन सका. हमारे लिए यहाँ अब केवल लज्जा ही शेष है. हमारे इस कथन से जो सहमत हैं , उन सभी लोगों की ओर से हम उन सभी अल्पसंख्यक और पीड़ित लोगों से अंतःकरण से माफ़ी चाहते हैं कि जिन्होंने यहां यातनाओं को सहा है. ” 

कुछ बांग्लादेशी नागरिक बांग्लादेशी हिन्दुओं के लिए वास्तव में चिंतित हैं , तब वहां कुछ आशा की किरण जरुर दिखाई देती है. पर यह हिन्दुओं के इस स्थिति को बदलने के लिए पर्याप्त नहीं है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यहूदियों ने एक मजबूत भूमिका निभाई है. आज दुनियाभर में वे यहूदियों की सुरक्षा को सुनिश्चित कर पाए , और उन्होंने विभिन्न वैश्विक प्लेटफार्मों पर इसराइल के लिए समर्थन जुटाया. जनगणना के अनुसार भारत में 3% से भी कम ईसाई हैं. पर गत कुछ माह से अमेरिका व वैश्विक शक्तियों की सहायता से इतने कम संख्या होने के बावजूद ईसाई समुदाय अपनी आवाज तथ्यहीन और निराधार स्थितियों के समर्थन में उठा रहे हैं. दूसरी ओर अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दुओं के अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) व विश्व हिन्दू परिषद की प्रबल शक्ति के बावजूद वैश्विक हिन्दू समाज आज उस स्थिति में दिखाई नहीं देता , जिससे कि बांग्लादेशी हिन्दुओं की स्थिति की ओर विश्व का ध्यान दिला सकें. दुनिया के किसी भी कोने में रहनेवाले हिन्दू भारत से स्वाभाविक अपेक्षा रखता है , पर भारत इस विषय पर चुप्पी साधे हुए बैठा है. क्योंकि भारत के राजनेताओं को यह डर है कि यदि वे हिन्दुओं के पक्ष में अपनी बात रखेंगे तो उनके तथाकथित सेकुलर होने की बात पर प्रश्न उपस्थित होगा. अंततः इस परिप्रेक्ष्य में यह बहुत व्यापक और गंभीर प्रश्न है कि यह बांग्लादेशी हिन्दुओं का धीरे-धीरे होनेवाला पतन है या पूर्णतः विनाश का संकेत ?

( स्रोत: न्यूज़ भारती हिंदी - 07 May 2015)