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मनोज ज्वाला

भारत को सदा-सदा के लिए अंग्रेजों का उपनिवेश बनाये रखने की कुटिल मंशा के तहत यहां के नवनिहालों पर अंग्रेजी शिक्षण-पद्धति को थोप देने वाला षड्यंत्रकारी टी.बी. मैकाले अपनी सफलता पर भले ही कभी भी हंसता रहा हो , किन्तु अब वह यह जान कर भारी सदमे में है कि उसकी कुटिल बुद्धि से निकले अंग्रेजी स्कूलों की बाढ़ न तो प्राचीन भारतीय शिक्षण पद्धति की जड़ों को पूरी तरह से उखाड़ पायी है , न ही उसके गुरुकुलों की समृद्ध परम्परा को बहाकर एकदम से नष्ट कर सकी है। रामनगर , साबरमति , अहमदाबाद स्थित हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला बनाम ‘ गुरुकुलम ’ उस पश्चिमी बाढ़ की धारा के विरुद्ध पूरी चमक-धमक से ऐसे सक्रिय है कि इसकी प्राचीन भारतीय शिक्षण-पद्धति की खनक ने मैकाले की नींद हराम कर दी है। अंग्रेजी शिक्षण पद्धति के द्वारा विलुप्ति के अंधेरे गर्त में डाल दिए गये भारतीय ज्ञान-विज्ञान को बौद्धिक धरातल पर लाकर अपने देश के नवनिहालों को देशज तत्त्वों से गढ़ने और उन्हें मल्टी नेशनल कम्पनियों के बजाये सर्वमंगलकारी राष्ट्र-भारतवर्ष के परम - वैभव का संवाहक बनाने में सक्रिय यह गुरुकुल न केवल मैकाले-अंग्रेजी स्कूलों से अपना लोहा मनवा चुका है , बल्कि अब दुनिया के तमाम आधुनिक स्कूलो को भी नतमस्तक होने के लिए विवश कर दिया है।

ऐसा इस कारण क्योंकि यहां के शिक्षार्थी-विद्यार्थी सम्पूर्ण दुनिया को ‘ शून्य ’ और ‘ दश्मलव ’ का ज्ञान प्रदान करने वाले ‘ वैदिक गणित ’ के गहरे सागर में गोता लगाते रहते हैं। मालूम हो कि हमारे भारत के प्राचीन ऋषि-महर्षियों द्वारा प्रतिपादित वेद-शास्त्र विविध विषयक ज्ञानामृत से सम्पूर्ण भरे हुए हैं। समय-समय पर अवतरित अनेक ऋषि-मुनि अपने ध्यान-योग-तप-साधना से ज्ञानामृत के इस भारतीय भण्डार की अभिवृद्धि ही करते रहे हैं। जिसके कारण समय चक्र भी हमारे इस दिव्य ज्ञान की चमक को फीका नहीं कर पाया। हमारे ऋषिकालीन ज्ञानामृत के भण्डार में रक्षित ‘ वैदिक गणित ’ ऐसा ही एक दिव्य ज्ञान ’ है। जिसमें विविध अंकों तथा अंक-समूहों के बीच गणना की विशिष्ट दुलर्भ पद्धतियां सूत्रात्मक ढंग से दर्शायी गयी हैं। आधुनिक गणितीय हथियार - कैलकुलेटर और कम्पयूटर की गति पर भारी पढ़ने वाली यह गणना-पद्धति दुनिया में अन्यत्र दुलर्भ ही है। किन्तु , काल-चक्र के प्रभाव और दुर्भाग्य से पिछले डेढ़-दो सौ वर्षों में ऋषि प्रणीत यह ज्ञान गंगा पश्चिम के गर्द-गुबार में हमारी आंखों से इस कदर ओझल हो गई कि धूर्त विदेशियों ने इसके विविध सूत्रों को हस्तगत कर लिया और हमें पता भी नहीं चला। इंग्लैण्ड , जर्मनी , फ्रांस आदि देशों के शासकों ने अपने यहां के शिक्षण-संस्थाओं के अध्ययन-अध्यापन-विषयक पाठ्यक्रमों में इसे शामिल कर लिया , तो कई बहुराष्ट्रीय विदेशी कम्पनियों ने इस दुलर्भ गणितीय ज्ञान को व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए अपना लिया। अमेरिकी शोध संस्था - ‘ नासा ’ के वैज्ञानिकों ने हमारे इस ऋषि-प्रणीत प्राचीन ज्ञानामृत को अपनी बोतल में भर कर उस पर अपनी बौद्धिक मिल्कियत का ‘ लेबल ’ चिपका कर आधुनिक शिक्षा बाजार में अपना बोलबाला कायम कर लिया और हम स्वयं की ही नाभि में रक्षित ‘ कस्तूरी ’ को ढूंढने के लिए वन-वन भटकते ‘ मृग ’ की भांति मूर्ख बने रहे। हमारे देश के शासक-प्रशासक और नीति-निर्धारक हमें पश्चिम के पीछे दौड़ाते रहे। पश्चिम के पीछे-पीछे उस भेड़-दौड़ में शामिल रहने और अपने बच्चों को भी शामिल कर लेने का परिणाम यह हुआ कि हम अपनी जड़ों से ही कट गए , ज्ञान-विज्ञान के सागर से दूर हट गए और ऊसर भूमि पर स्थापित यूरोपियन शिक्षण-पद्धति व उसके संस्थानों के मोहताज बन गए। इस तथ्य को एकदम भूल गए कि भारतीय शिक्षण-पद्धति और इसके ‘ गुरुकुल ’ तो विद्यार्थियों को ‘ ऋषि-महषि ’, ‘ योद्धा-ज्ञानी ’ ही नहीं ‘ नर से नारायण ’ बनाने में भी सक्षम रहे हैं। क्योंकि यहां छात्रों को केवल पदार्थ विज्ञान ही नहीं , बल्कि अध्यात्म विज्ञान के साथ-साथ धर्म-संस्कृति-आचार-विचार , संस्कार-उपचार भी पढ़ाए जाते रहे हैं।

अहमदाबाद (गुजरात) के रामनगर-साबरमति में स्थित हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला एक ऐसा ही ‘ गुरुकुलम ’ है जहां विविध विषयक ज्ञान-विज्ञान-गणित-साहित्य के साथ-साथ वैदिक गणित , आयुर्वेद , ज्योतिष , धर्म , विज्ञान तथा संगीत कला , चित्रकला , नृत्यकला , नाट्यकला और गायन-वादन-अभिनयन सहित पुरुषों के जीवनोपयोगी 72 कलाओं की उत्कृष्ट शिक्षा दी जाती है। इतना ही नहीं , योग , व्यायाम , ध्यान , कुश्ती , मलखम्ब आदि विविध शारीरिक क्रियाओं और भारतीय खेलों को भी प्रशिक्षण दिया जाता है। देश के प्रबुद्ध लोगों का मानना है कि भारत के पुर्ननिर्माण का मार्ग इस गुरुकुल के मार्ग से प्रारम्भ होता है। मालूम हो कि अपने देश में मैकाले-प्रणीत अंग्रेजी शिक्षा के भयंकर विनाशकारी और राष्ट्रघाती परिणाम देख लेने के बाद अब शिक्षा की इस प्रणाली को बदलने और ऐसी शिक्षा-शैली अपनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है , जिसमें भौतिकता के साथ-साथ राष्ट्रीयता , नैतिकता , आध्यात्मिकता , उत्त्कृष्टता , चिन्तनशीलता , बौद्धिकता एवं सुसंस्कारिता के पाठ भी सम्मिलत हों। हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला नामक इस ‘ गुरुकुलम ’ की भारतीय शिक्षा प्रणाली के विशिष्ट पाठ्यक्रम ने आज अपने राष्ट्र के समक्ष ऐसी ही एक नवीन पहल प्रस्तुत की है।

इस गुरुकुलम के छात्र अत्यंत सरलता से तमाम विषय-विद्याओं के साथ-साथ वैदिक गणित का ऐसा गहरा अध्ययन कर रहे हैं कि आज सारे देश-दुनिया का बौद्धिक महकमा इनका लोहा मान रहा है। इस बाबत इस गुरुकुल में इनके निष्णात विशेषज्ञ गुरुजन नियुक्त किये गए हैं। वैदिक गणित पढ़ने के कारण गुरुकुलम के ये छात्र कई बार गणितीय ज्ञान की गहनता के मापदण्ड पर सर्वोच्च उपलब्धि के सर्वाधिक अंक प्राप्त कर चुके हैं। वैदिक गणित की प्रान्तीय-राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहली बार में ही गुरुकुलम का जयघोष-

उल्लेखनीय है कि ‘ अलोहा इंटरनेशनल ’ नामक एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था द्वारा दिनांक 8-11-2015 को आयोजित गुजरात राज्य-स्तरीय गणित प्रतियोगिता में इस ‘ गुरुकुलम ’ के छात्र-तुषार विमलचंद तलावट ने महज 03 मिनट 30 सैकेण्ड में 70 सवालों को हल करते हुए 5,300 प्रतियोगियों को पराजित कर पहली बार में ही प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया था।

उसके बाद दिनांक 26-27 दिसम्बर 2015 को ‘ मेन्टल कैलकुलेशन इण्डिया कप ’ की राष्ट्रीय स्तर पर गणित प्रतियोगिता चेन्नई में आयोजित हुई। उस प्रतियोगिता में देशभर से 19 राज्यों के 4,300 प्रतियोगी शामिल हुए थे। उन सभी प्रतियोगियों में सबसे कम उम्र के तुषार ने छह अंकों के जोड़-घटाव और तारीख सम्बन्धी 70 सवालों के जवाब कम्पयूटर से भी तीव्र गति से मात्र 3 मिनट 10 सैकेण्ड में देकर सभी 4,300 प्रतिभागियों को पछाड़ते हुए प्रथम स्थान का विजेता बन देशभर में गुरुकुलम की शिक्षा पद्धति का डंका बजा दिया। मालूम हो कि उस दौरान तुषार के साथ कैल्कुलेटर के साथ ताल मिलाने वाले परीक्षक भी उससे पीछे रह गए थे। इस जीत के लिए उसे विजेता ट्राफी और श्रेष्ठ चैम्पियन ट्राफी प्रदान की गई थी।

26-27 दिसम्बर 2015 के उस ऐतिहासिक जय-घोष के बाद तुषार ने अजेय धनुर्धारी अर्जुन की भांति ज्ञान-साधना की बदोलत महज एक ही महीने बाद नया लक्ष्य तब साधा , जब उसी चेन्नई शहर में ‘ हिन्दुस्तान मैथ्स ओलम्पियाड ’ की ओर से एक अंतर्राष्ट्रीय गणित-प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। उस प्रतियोगिता में शामिल हुए 1,700 प्रतियोगियों को पछाड़ते हुए तुषार ने मात्र 3 मिनट 15 सैकेण्ड में ही 100 सवालों का हल प्रस्तुत कर प्रथम स्थान प्राप्त कर समस्त बौद्धिक जगत में गुरुकुलम और उसकी प्राचीन शिक्षा-पद्धिति की विशिष्टता का जलवा बिखेरा था।

सिर्फ गुजरात ही नहीं , अपितु समस्त भारत-राष्ट्र का गौरव बन चुके तुषार की यह विजय वास्तव में प्राचीन भारतीय गुरुकुल-शिक्षा-पद्धति की महान विजय सिद्ध हुई है , जो इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित होने के योग्य है। उसकी इस सराहनीय उपलब्धि ने हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला नामक गुरुकुलम की ‘ गुरुता ’ में चार चांद लगाते हुए भारतीय शिक्षा-पद्धति की आन-बान-शान को बढ़ाया है। इस अभूतपूर्व गणितीय मेधा से अद्वितीय कीर्तिमान स्थापित कर गुजरात का भी नाम रौशन करने वाले तुषार को राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने खासतौर पर एक पत्र लिखकर उसका अभिनन्दन किया है। जबकि गुजरात के राज्यपाल महामहिम ओमप्रकाश कोहली ने इस अनूठे गुरुकुल के संचालक - उत्तम भाई जवानमल शाह , जो मैकाले शिक्षण-पद्धति की तमाम डिग्रियों से मुक्त है , को ऐसी प्रखर प्रतिभा-मेधा गढ़ने के इस कार्य के लिए स्वयं अपने हाथों से सम्मानित किया है।