इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केन्द्र


मजहब के आधार पर सामने आई जनगणना रिपोर्ट के सांस्कृतिक-राजनीतिक निहितार्थ हैं। आजादी के बाद देश में पहली बार हिंदुओं की आबादी 80 प्रतिशत से कम हुई है। देश के सात राज्यों- मिजोरम , नागालैंड , मेघालय , जम्मू-कश्मीर , अरुणाचल प्रदेश , पंजाब , मणिपुर और लक्षद्वीप में हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक हैं। यह स्थापित सत्य है कि देश के जिस किसी भी हिस्से में हिंदू और हिंदू परंपराओं का क्षय हुआ है , वहां अलगाववाद की समस्या बढ़ी है। भारत में पंथनिरपेक्षता और बहुलतावाद संविधान के किसी अनुच्छेद के कारण नहीं है। यह सनातन संस्कृति के सहिष्णु जीवन दर्शन और उदार मान्यताओं के कारण ही संभव हो पाया है। भारत में बहुलतावाद और पंथनिरपेक्षता तभी तक अक्षुण्ण रहेंगी , जब तक हिंदू और हिंदू मान्यताएं अक्षत रहेंगी। अन्यथा क्या कारण है कि भारत की कोख से ही जन्मे पाकिस्तान और बांग्लादेश में पंथनिरपेक्षता और बहुलतावाद के लिए कोई स्थान नहीं है ? क्यों भारतीय संसाधनों से पल रही कश्मीर घाटी में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगते हैं ? क्यों घाटी की संस्कृति के मूल ध्वजवाहकों , कश्मीरी पंडितों को खदेड़ भगाया गया ? नागालैंड जैसे पूवरेत्तर के कुछ राज्यों में चर्च समानांतर सरकार चलाता है। चर्च द्वारा चलाए जा रहे मतांतरण से पूवरेत्तर के जनसांख्यिक स्वरूप में तो अंतर आया ही है , स्थानीय नागरिकों के एक बड़े वर्ग में भारत के प्रति स्वाभाविक लगाव को भी क्षति पहुंची है।

 

जब कभी चर्च के मतांतरण अभियान पर प्रश्न खड़ा होता है , सेक्युलरिस्ट उसके संरक्षण में सड़कों पर उतर आते हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़े चर्च के दावों की कलई खोलते हैं। 2001 से 2011 के बीच ईसाई समुदाय की आबादी वृद्धि दर स्थिर पाई गई। देश का ईसाई समुदाय सभी मजहबी समुदायों (पारसियों को छोड़कर) से संपन्न और साक्षर है। 1991 से 2011 के बीच ईसाई समुदाय की आबादी 1.9 प्रतिशत प्रति वर्ष से अधिक की दर से बढ़ी , जबकि इस काल अवधि में हिंदुओं की आबादी 1.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी। अधिक साक्षरता दर और समृद्धि के कारण ईसाई समाज में परिवार नियोजन के प्रति स्वाभाविक जागरूकता है। कम प्रजनन दर के कारण ईसाई समुदाय की आबादी की वृद्धि दर में गिरावट आनी चाहिए थी। सिखों में भी संपन्नता और साक्षरता अन्य समुदायों से अधिक है। 1991 से 2011 के बीच सिखों की आबादी 1.2 प्रतिशत की दर से बढ़ी। यदि 2001 से 2011 के बीच ईसाई समुदाय की आबादी में 1.2 प्रतिशत की दर से ही वृद्धि हुई होती तो उनकी कुल वास्तविक आबादी 2 करोड़ 41 लाख होनी चाहिए थी , जबकि 2011 में उनकी आबादी 2 करोड़ 78 लाख पाई गई। यह जो 37 लाख का अंतर है , यह वास्तव में चर्च द्वारा मतांतरित कराए गए लोगों की संख्या है। इस हिसाब से 1991 से 2011 के बीच चर्च ने हर साल दूसरे मत के मानने वाले 1.7 लाख लोगों को ईसाइयत में दीक्षित किया।

 

भारत में मिशनरी प्रचारक मतांतरण अभियान के लिए आदिवासी और दलित-वंचित वर्ग को ही निशाना बनाते आए हैं। मतांतरण के लिए झूठ , फरेब और प्रलोभन से चर्च को परहेज नहीं है। 2011 जनगणना के मजहबी आंकड़े आंखें खोलने वाले हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार देश की कुल आबादी में मुसलमानों का अनुपात 13.4 प्रतिशत था , जो 2011 में बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गया है। पिछले चार सालों ( 2011-2015) में वास्तविक वृद्धि का अनुमान नहीं लगाया जा सकता , किंतु 2001 से 2011 के बीच के दस सालों में यह वृद्धि 24.6 फीसद की दर से हुई है। इस अवधि में हिंदुओं की वृद्धि दर गिर कर 16.8 प्रतिशत आ गई। 1991-2001 के दशक में यह वृद्धि दर 19.9 प्रतिशत थी। 2001 में हिंदुओं की आबादी 80.5 फीसद थी , जो 2011 में घटकर 79.8 प्रतिशत हो गई। असम के अलावा देश के अन्य भागों में रह रहे अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहयांग मुसलमानों की जनगणना में गिनती नहीं की गई है। यदि उनकी संख्या जोड़ दी जाए तो तस्वीर और भी भयावह होगी। एक ओर जहां कई राज्यों में हिंदुओं की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई है वहीं सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मुस्लिम आबादी में वृद्धि दर्ज की गई है। ऐसे कई राज्य , जहां मुस्लिमों की आबादी दर में भारी वृद्धि दर्ज की गई है वहां उनकी साक्षरता दर भी उच्च है।

 

वस्तुत: मुसलमान राजनीतिक रूप से अत्यधिक साक्षर हैं , इसीलिए वे अपनी बड़ी संख्या को एक सुरक्षा के रूप में देखते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि चुनाव के दौरान सेक्युलर दलों में मुसलमानों का थोक वोट पाने के लिए होड़ लगती है और बदले में मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी रहनुमा ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक दोहन की जुगत में रहते हैं। किंतु इस ब्लैकमेलिंग और तुष्टीकरण के खेल से मुस्लिम समुदाय का भला हो सकता है ? विभाजन के समय पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हिंदू धर्मावलंबियों की आबादी उस क्षेत्र की कुल आबादी का 30 प्रतिशत थी और पश्चिमी पाकिस्तान (अब पाकिस्तान) में हिंदू-सिखों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से अधिक थी। भरतीय उपमहाद्वीप में हिंदू-सिख कुल जनसंख्या के 75 प्रतिशत से थोड़ा कम और मुसलमान 24 प्रतिशत से कम थे। आज भारत की आबादी 121 करोड़ , पाकिस्तान 20 करोड़ से कम और बांग्लादेश 20 करोड़ अर्थात् तीनों देशों की कुल आबादी 161 करोड़ है। यदि हिंदुओं की आबादी इस कुल आबादी में उतने ही प्रतिशत (अर्थात् 75 प्रतिशत) रहती जितनी विभाजन के समय थी तो इन तीनों देशों की कुल आबादी में हिंदुओं की आबादी 120 करोड़ के लगभग होती। इसके विपरीत इस उपमहाद्वीप में हिंदुओं की कुल आबादी 98 करोड़ (भारत 96 करोड़ , पाकिस्तान 50 लाख और बांग्लादेश 1 करोड़ 60 लाख) है। ये 21 करोड़ हिंदू-सिख कहां गए ? कटु सत्य है कि हिंदुओं की आबादी का प्रतिशत भारत , पाकिस्तान और बांग्लादेश , तीनों में कम हुआ है। आंशिक सत्य तो यह भी है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में लाखों हिंदुओं को तलवार के दम पर मजहब बदलने के लिए मजबूर किया गया। हिंदुओं की घटती वृद्धि दर बहुलतावाद और पंथनिरपेक्ष जीवन मूल्यों के लिए खतरा साबित हो सकती है।

 

( लेखक बलबीर पुंज राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)