इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केन्द्र


(11 सितम्बर , विश्वबंधुत्व/दिग्विजय दिवस पर विशेष)

 

अपने ओजस्वी वाणी से भारत की महिमा को विश्वपटल पर आलोकित करनेवाले स्वामी विवेकानन्द का सन्देश समूची मानवता की अनमोल धरोहर है। दुनियाभर के महान ज्ञानी , विज्ञानी , चिंतकों , कलाकारों और विशेषकर युवाओं के हृदय को स्वामीजी के शक्तिदायी विचार आंदोलित करते रहे हैं। फिर भी आज भारत सहित विश्व के बहुसंख्यक लोग स्वामीजी के संदेशों से अवगत नहीं हैं। अमेरिकी लेखिका एलिनोर स्टार्क अपने पुस्तक “The Gift Unopened : A new American Revolution” में लिखती हैं कि “ क्रिस्टोफर कोलम्बस ने अमेरिका की भूमि का आविष्कार किया , परन्तु स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका की आत्मा का आविष्कार किया। ’’

 

लेखिका के अनुसार , स्वामी विवेकानन्द की सबसे बड़ी देन वेदान्त है , जो अमेरिकनों की अपूर्णता को दूर कर देगा। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि वह ‘Gift’ ( भेंट) अब भी ‘Unopened’ ( अनखुली) ही रह गई। यह अनमोल ‘Gift’ क्या है ? इस बात पर सम्पूर्ण विश्व को विचार करना होगा , विशेषतः भारत को।

 

11 सितंबर , 1893 को अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन के पहले दिन स्वामी विवेकानन्द ने अपने सात मिनट के छोटे से व्याख्यान से दुनिया को जीत लिया। “ मेरे अमेरिका के बहनों और भाइयों... ” कहकर उन्होंने अपना उद्बोधन प्रारंभ किया। स्वामीजी के इस प्रसिद्ध एवं प्रथम उदबोधन का यह प्रथम वाक्य , जिसने वहां के श्रोताओं के हृदय में मानों एक अदभुत विद्युत तरंगों को प्रवाहित कर दिया। यह केवल उद्बोधन की मात्र एक शैली नहीं थी , अपितु स्वामीजी के उन शब्दों में भारत की महान आध्यात्मिक शक्तियां ही मुखरित हुर्इं। अपने इस भाषण में स्वामीजी ने कहा कि , “ मुझे ऐसे देश का धर्मावलम्बी होने का गौरव है , जिसने संसार को ‘ सहिष्णुता ’ तथा ‘ सभी धर्मों को मान्यता प्रदान ’ करने की शिक्षा दी है। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है , जिसने इस पृथ्वी की समस्त पीड़ित और शरणागत जातियों तथा विभिन्न धर्मों के बहिष्कृत मतावलम्बियों को आश्रय दिया है। ”

 

अमेरिका का वह श्रोता समाज जो केवल हठधर्मिता का दावा ही सुनते आया था , उन्होंने प्रथमतः स्वामी विवेकानन्द के द्वारा धार्मिक एकता का संदेश सुना। विश्व धर्म सम्मलेन के अंतिम दिनों में स्वामी विवेकानन्द ने धार्मिक कट्टरवादियों तो चेतावनी देते हुए कहा था- ‘… किन्तु , यदि यहां कोई यह आशा कर रहा कि यह एकता किसी एक धर्म की विजय और बाकी सब धर्मों के विनाश से सिद्ध होगी , तो उनसे मेरा कहना है कि ‘ भाई , तुम्हारी यह आशा असंभव है। ’ … इस सर्वधर्म महासभा ने जगत के समक्ष यदि कुछ प्रदर्शित किया है , तो वह यह है कि – शुद्धता , पवित्रता और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय विशेष की एकान्तिक सम्पत्ति नहीं है , एवं प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय उन्नत-चरित्र के स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है। अब इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्यान्य सारे धर्म नष्ट हो जाएंगे और केवल उसका धर्म ही जीवित रहेगा , तो उसपर मैं अपने हृदय के अन्त: स्थल से दया करता हूं और उसे स्पष्ट बता देता हूं कि शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद , प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णअक्षरों में लिखा होगा- ‘ युद्ध नहीं , सहायता ’, ‘ विनाश नहीं , सृजन ’, ‘ कलह नहीं , शांति ’ और ‘ मतभेद नहीं , मिलन! ’

 

पहली बार स्वामी विवेकानन्द के रूप में पश्चिमात्य श्रोता समाज ने विश्वबंधुत्व का संदेश उचित समय पर सही परिप्रेक्ष्य में समझा। इस सन्देश की अनदेखी से दो बार विश्वयुद्ध हो गया। आज भी विश्व के अनेक देशों में साम्प्रदायिक तनाव , व्यापारिक स्वार्थ सिद्धि के लिए बैरभाव और अपनी भूमि विस्तार के लिए अन्य देशों की जमीन पर अधिकार ज़माने की दुष्ट प्रवृत्तियों ने जन्म लिया है। इस प्रवृत्ति ने आतंकवाद , धर्मांतरण , लव जिहाद और विस्तारवाद को जन्म दिया है। केवल बाहरी दिखावेवाली एकता द्वारा विश्व बंधुत्व के सूत्र में नहीं बंध सकता , इसके लिए दुनिया के तमाम देशों को अन्य देशों और समुदायों के हितों , अधिकारों और भावना का सम्मान बड़ी आत्मीयता से होगा। बनावटी एकता मानवीय मूल्यों को नष्ट करती है। किन्तु एकात्मता विविध समुदायों की विशेषताओं को बनाए रखते हुए बंधुत्व के सूत्र में बांधती है। इसलिए इस दिन का संदेश उनके लिए भी है जो हठधर्मी है और मतांतरण के माध्यम से विविध जनजाति समुदायों की मान्यताओं और संस्कृति को करते हैं।

 

स्वामी विवेकानन्दजी ने विश्वपटल पर जहां भारत को गौरवान्वित किया , वहीं उन्होंने भारत आकर भारतीय जनमानस को झंझोर कर जगाया। इतना ही नहीं उन्होंने भारत में विद्यमान सभी मत-सम्प्रदायों और जातियों में व्याप्त दोषों से जनसामान्य को अवगत कराया और बताया कि मैं उस धर्म में विश्वास नहीं करता जो किसी भूखे को रोटी न दे सके। उनका स्पष्ट कहना था कि देश की गरीबी , अज्ञानता , विषमता और नारी समाज की उन्नति के बिना भारत का उत्थान संभव नहीं है।

 

स्वामी विवेकानन्द ने अग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त और हताशा में डूबे भारतवर्ष में स्वतंत्रता की चाह उपजायी। गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारतीय समाज को स्वतंत्रता का मंत्र देते हुए उन्होंने कहा , “ आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्मभूमि भारतमाता ही मानो आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी- देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। अपना सारा ध्यान इसी एक ईश्वर पर लगाओ , हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है। सर्वत्र् उसके हाथ हैं , सर्वत्र् उसके पैर हैं और सर्वत्र उसके कान हैं। समझ लो कि दूसरे देवी-देवता सो रहे हैं। जिन व्यर्थ के देवी-देवताओं को हम देख नहीं पाते , उनके पीछे तो हम बेकार दौडें और जिस विराट् देवता को हम अपने चारों ओर देख रहे हैं , उसकी पूजा ही न करें ? जब हम इस प्रत्यक्ष देवता की पूजा कर लेंगे , तभी हम दूसरे देव-देवियों की पूजा करने योग्य होंगे , अन्यथा नहीं। ”

 

आज जब हम स्वामी विवेकानन्दजी के विचारों का अध्ययन करते हैं तो ज्ञात होता है कि स्वामीजी एक संन्यासी होने के बावजूद देश की वास्तविक स्थिति पर सूक्ष्म दृष्टि रखते थे। अध्यात्म को व्याहारिक जीवन में प्रगट करने पर वे विशेष जोर देते थे। उन्होंने कहा भी कि , “ त्याग और सेवा ही भारत का राष्ट्रीय आदर्श है। ” बिना त्याग और सेवा के देश का उत्थान नहीं हो सकता। इसलिए आज की आवश्यकता है कि हम हमारे देशवासियों को इससे अवगत कराएं ताकि सब लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में त्याग और सेवा को चरितार्थ कर सकें।