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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना आज से नब्बे वर्ष पूर्व विजयदशमी के दिन हुई थी। संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत तक ने भारत को शिखर पर पहुंचाने के लिए लोगों को निरंतर प्रेरित करने का काम किया है। भ्रम फैलाने की तमाम कोशिशों के बावजूद संघ का कार्य बढ़ता गया है। संघ स्वयं में न केवल विश्व का सबसे बड़ा और प्रगतिशील संगठन है , बल्कि उसके स्वयंसेवकों ने राजनीति समेत अन्य सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज संघ का एक स्वयंसेवक देश का प्रधानमंत्री है और वसुधैव कुटुंबकम् की भारतीय आकांक्षा के अनुरूप दुनिया को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए आशा काकेंद्र बना हुआ है। सर्वे भवंतु सुखिन: की भारतीय अवधारणा आज विश्व के लिए अस्तित्व बनाए-बचाए रखने के लिए एकमात्र राह के रूप में दिख रही है।

 

भारतीय आदर्शो की वैश्विक साख है। संभव है यह कुछ लोगों के लिए सिरदर्द हो , लेकिन विश्व भर में बसे भारतीय मूल के लोगों को अपनी संस्कृति और सभ्यता के प्रति गौरवान्वित होना चाहिए। इसकी झलक प्रधानमंत्री मोदी की यात्रओं में भी दिखती है। आज यह यह स्पष्ट है कि हेडगेवार ने व्यक्ति निर्माण के जिस कार्य को एक छोटे से मैदान में शुरू किया था उसका प्रतिफल अब राष्ट्र को मिलने लगा है। इसके लिए वर्षो तक स्वयंसेवकों ने तपस्या की है। हेडगेवार अकेले आए , लेकिन उन्होंने स्वयं को बीज के समान बोकर संघ को उगाया। उन्होंने लाखों लोगों को समाज सेवा करने की जैसी प्रेरणा दी उसका दूसरा उदाहरण मिलना असंभव है।

साम्यवादियों ने संघ को मुसोलनी और हिटलर का अनुगामी बता दिया और प्रचार किया कि संघ की स्थापना उनके परामर्श से ही हुई है। अंग्रेजों ने 1934 में संघ पर पहली बार प्रतिबंध लगाया था। उसके बाद महात्मा गांधी की हत्या , निरंकुश आपातकाल के दौर में और अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद भी इस संगठन को प्रतिबंधित किया गया। अंग्रेजों द्वारा लगाए गए प्रतिबंध का विरोध सभी राजनीतिक दलों ने किया , गांधी की हत्या के बाद का प्रतिबंध संघ स्वयंसेवकों के सत्याग्रह से हटा और आपातकाल में लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए स्वयंसेवकों ने तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार को उखाड़ फेंकने में अपनी अहम भूमिका निभाई , जबकि विवादित ढांचा गिरने के बाद लगे प्रतिबंध को न्यायालय ने अवैध करार दिया। राष्ट्र के प्रति समर्पित सेवाभावना और निष्पक्षता के बावजूद संघ को भ्रामक प्रचार के माध्यम से घेरने का प्रयास जारी रहा , जो आज भी चल रहा है। समाज के सभी क्षेत्रों में संघ के स्वयंसेवक सक्रिय योगदान दे रहे हैं। इस सक्रियता ने उन तमाम लोगों को संघ के अनुकूल बनाने का काम किया है जो उसके सर्वथा विरोध में थे। उदाहरण के लिए जयप्रकाश नारायण संघ को सदैव के लिए प्रतिबंधित किए जाने के पक्षधर थे। बावजूद इसके संघ के प्रति लोगों का लगाव यदि बढ़ा तो उसका कारण मूल्यों और आदर्शो का पालन रहा है। डॉक्टर हेडगेवार ने कहा था कि संघ हिन्दुओं का संगठन है। इस पर संघ को मुस्लिम और ईसाई विरोधी संगठन के रूप में प्रचारित करने का प्रयास चला आ रहा है। यह भी प्रश्न किया गया कि यदि संघ वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास रखता है तो वह सिर्फ हिन्दुओं का संगठन ही क्यों है ? संघ के संस्थापक और सभी सरसंघचालकों ने बार-बार इसका उत्तर दिया है कि जब तक हमारा स्वयं और अपने गौरवमय अतीत व ऋषियों द्वारा प्रदत्त जीवनशैली पर विश्वास नहीं होगा तब तक हम दूसरों का भरोसा कैसे जीत सकेंगे ? मुसलमानों का विरोध करने के लिए संघ की स्थापना की चर्चा पर डॉक्टर हेडगेवार ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति व्यायाम कर अपने शरीर को बलिष्ठ बनाता है तो क्या इसलिए कि वह पड़ोसी की पिटाई कर सके। अपने को स्वस्थ रखना तो स्वाभाविक है और जो स्वस्थ रहेगा उसे कोई भी नहीं पीट सकता।

 

संघ ने हिंदू समाज को तमाम कुरीतियों से भी मुक्त कराने का अभियान चलाया। वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में उन परंपराओं को त्यागने की भी अपील की है जो कालवाह्य हो चुकी हैं। इस विचार का कुछ रूढ़िवादियों द्वारा उसी प्रकार विरोध हो सकता है जैसा कि आधुनिकता के अलंबरदार और निहित स्वार्थी कुछ लोगों ने संघ को प्रतिगामी और संकुचित तथा सांप्रदायिक संगठन कहकर पूर्व में बरगलाने का प्रयास किया। परंतु संघ लक्ष्य से भटके बिना न दैन्यं न पलायनम् के संकल्प के साथ आगे बढ़ता जा रहा है। हिन्दू आतंकवाद , भगवा आतंक , हिन्दू राष्ट्र का भय आदि शब्दों का प्रयोग कर समाज को भ्रमित करने में लगे लोगों को जब संघ की गति रोकने में सफलता नहीं मिली तो अब वे सरसंघचालक के किसी कथन विशेष को तोड़-मरोड़कर हिन्दू समाज में दरार पैदा करने में लग गए हैं। जिन लोगों ने जातीयता का विष बोया वे पारिवारिक संपन्नता में सीमित हो गए हैं और ‘ सेक्युलर ’ का मुखौटा लगाकर संघ के खिलाफ सांप्रदायिकता का प्रचार कर रहे हैं।

 

हमारी मान्यताओं-परंपराओं का जब भारत में सम्मान होगा तभी विश्व उन मान्यताओं-परंपराओं को स्वीकार करेगा। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने तीन महीने के भीतर सारे देश में गोवंश हत्या निषेध कानून लागू करने के लिए केंद्र सरकार का आह्वान किया है। गंगा , धरती और गो माता की सुरक्षा , संरक्षा और संवर्धन भारतीय अस्मिता के लिए अपरिहार्य है। संघ की प्रार्थना में सबसे पहले ‘ सदा वत्सला मातृभूमि ’ कहा गया है और सबसे अंत में मातृभूमि को परम वैभव के शिखर पर पहुंचाने का संकल्प है। इन दोनों के बीच आचरण की शुचिता , बुद्धि की तीक्ष्णता , कर्तव्य की निष्ठा और धैर्य व शौर्य की अपरिहार्यता में जीवन के विकास का संदेश निहित है। संघ अपनी स्थापना की शताब्दी की ओर बढ़ रहा है और भारत उसकी अवधारणा के अनुरूप वसुधैव कुटुंबकम की ओर। संघ एक जीवंत संगठन है। जीवंत संगठन वही होता है जो स्वाभिमानी हो , अपनी निष्ठा और आस्था पर अडिग हो। संघ का संकल्प अनेक झंझावतों का सामना करता हुआ आगे बढ़ रहा है।

 

( लेखक राजनाथ सिंह ‘ सूर्य ’ राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं)

(साभार : दैनिक जागरण)