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अयोध्या आन्दोलन के नायक अशोक सिंहल – एक परिचय

जन्म- 27 सितम्बर, 1926 आगरा में

मूल निवासी- बिजौली जिला अलीगढ़

अध्ययन- इलाहाबाद में रहकर

शिक्षा- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से माइनिंग मैटलर्जी में इंजीनियरिंग की उपाधि प्राप्त

 

 

आजादी के पहले काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग (बीटेक) के छात्रों की जो खेप निकली , श्री अशोक सिंहल भी उसका हिस्सा थे। लेकिन अशोक जी ने नामी डिग्री के साथ कैंपस रिक्रूटमेंट के उस दौर में नौकरी का मार्ग नहीं चुना। देश के बंटवारे ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। लाखों लोगों के विस्थापन ने उन्हें हिलाकर रख दिया था , जिसे उन्होंने भारत माता के तौर पर देखा, माना और पूजा था , उसके बंटवारे ने उनके मन को द्रवित कर दिया था। विशेष रूप से हिंदू धर्म और संस्कृति के लिए जीने की भावना उनके मन में हिलोर ले रही थी। उस दौर में हिंदुत्व की प्रयोगशाला के सबसे बड़े धर्मस्थान गोरखपुर के गोरक्षनाथ मंदिर में उन्होंने डेरा डाला। तब एक तरफ वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजदीक थे तो दूसरी ओर मन में आध्यामिक साधना का भाव था। गीता प्रेस और गीता वाटिका में वेदों और उपनिषदों का उन्होंने गहन अध्ययन किया। साथ ही रा.स्व.संघ के प्रचारक प्रोफेसर राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैय्या और भाऊराव देवरस का सान्निघ्य पाकर उन्होंने तय कर लिया कि वे संघ के कार्य में जीवन समर्पित करेंगे। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक पूज्य श्री गुरुजी के नज़दीक आए तो उनका मन जैसे खिल उठा। एक आध्यात्मिक विभूति से मिलकर एक आध्यात्मिक मन संतप्त हो गया। वे आध्यात्मिक राष्ट्रीयता की भरपूर ऊर्जा के साथ एक जीवन संकल्प को अपना कर जिस पथ पर चल पड़े, अंतिम सांस तक उस पर अडिग रहे।   

 

 

अशोक जी सिंहल के परिवार में संघ का संपर्क रज्जू भैया के चलते ही आया। दरअसल रज्जू भैय्या और अशोक सिंहल दोनों के पिता प्रशासनिक अधिकारी थे। रज्जू भैया का मूल बुलंदशहर के बनैल गांव में था तो अशोक जी का मूल भी निकट के जिले अलीगढ़ के बिजौली गांव में था। सरकारी नौकरी के चलते दोनों परिवार इलाहाबाद में अगल-बगल ही रहते थे।  इसलिए दोनों परिवारों में रिश्ता बहुत गहरा बना।  

 

 

श्री गुरूजी से भेंट के बाद फिर अशोक जी ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। संघ प्रचारक के रूप में संगठन के रास्ते पर वो बढ़ चले। 1950 और 1960 के दशक में अशोक जी गोरखपुर , कानपुर और सहारनपुर में प्रचारक रहे तो बाद में पूरा उत्तराखंड देहरादून-हरिद्वार और उत्तरकाशी तक उन्होंने संघ की शाखाओं के विस्तार का काम किया। इसी के साथ उनका संबंध आध्यात्मिक साधना में लीन देश के महान साधु-संतों के साथ भी हुआ। संघ प्रचारक के रूप में अशोक जी की निकटता पं. दीनदयाल उपाध्याय से हुई। दीनदयाल जी उन्हे बहुत स्नेह करते थे। अशोक सिंहल के पूरे जीवन पर दीनदयाल उपाध्याय की वैचारिक छाप बहुत गहरे तक पड़ी। दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के बाद उनकी श्रद्धांजलि में अशोक सिंघल ने बहुत भाव प्रवण गीत सुनाया।  

 

 

अशोक जी सिंहल शास्त्रीय संगीत में भी तज्ञ थे। उन्होंने अनेक गीत रचे और उन्हें स्वर भी दिया। उनके कंठ में जैसे सरस्वती का वास था। ऊंचे सुर में गाए उनके गीत पं ओंकार ऩाथ ठाकुर की याद दिलाते थे। काशी विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान उनका संपर्क पं ओंकार नाथ ठाकुर सहित अनेक संगीतज्ञों से भी आया। पर राष्ट्रकार्य के लिए उन्होंने अपनी इस रूचि और प्रतिभा को भी महत्व नहीं दिया। उन्होंन संघ के लिए गीत गाए। वे गीत संघ स्वयंसेवक आज भी गाते हैं।

 

 

देश की आजादी के आंदोलन में भी अशोक जी सिंहल सक्रिय रहे थे। रज्जू भैया और अशोक जी सिहंल ने गांधी जी के आह्वान पर 1942 के आंदोलन में हिस्सा लिया था। संघ के प्रचारक बनने के बाद वे उत्तर प्रदेश में विद्यार्थी परिषद के पालक अधिकारी भी थे। इसलिए 1975 में जब आपातकाल लागू हुआ तो उन्होने इसके विरूद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया। फिर दिल्ली में आकर रणनीति बनाने का काम किया। उन पर दिल्ली के प्रातं प्रचारक का दायित्व आया। 1980 में उन्हें विश्व हिंदू परिषद का दायित्व सौंपा गया।

 

 

यही वो कालखण्ड था जब अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन करवट लेने लगा था। राम मंदिर को लेकर उनका जुड़ाव बेहद भावुक था जिस पर उन्होंने कभी कोई समझौता मंजूर नहीं किया। उनकी योजकता और संगठन कुशलता प्रमाण राम जानकी रथ यात्रा, गंगा यात्रा, राम ज्योति यात्रा की सफलता में दिखायी देते हैं। बहुत कम समय में एक बड़ा जनांदोलन खडा करना उनकी ही विशेषता कही जाएगी। सन 1982 में मुज्जफर नगर मे रामजन्म भूमि का मामला पहली बार सामने आया और 1 फरवरी 1986 को वहां लगा ताला खोलने के आदेश हो गए। फिर शिलान्यास और एक के बाद एक कारसेवा से लेकर बाबरी ढ़ांचे के ध्वंस तक का इतिहास को हिन्दू समाज के पुनर्जागरण का एक स्वर्णिम अध्याय है।

 

 

इस आंदोलन का बडा आयाम यह है कि अशोक जी सिंहल पूरे देश के साधु-संतों को एक मंच पर लाने में सफल हुए। यह उनकी विनम्रता और संत शक्ति के प्रति अगाध श्रद्धा के चलते ही संभव हो पाया। वे संतों के प्रति इतना आदर भाव प्रकट करते थे कि संत अभिभूत हो जाते थे । संत स्वयं उन्हें श्वेत वस्त्र में एक श्रेष्ठ संत की उपाधि देते थे। देश भर के सभी शंकराचार्यों, वरिष्ठ संतों, अखाडों के महंतों, कथा वाचकों और समाज सुधारकों में अशोक जी को काफी सम्मान की नजर से देखा जाता था। उन्हें सबका स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त था।

 

 

साधु-संतों को एक मंच पर लाने के साथ ही हिन्दू समाज को एकजुट करना एक बड़ा उद्देश्य सामने था। रा स्व संध अपने स्थापना काल से इसी में जुटा है। राम मंदिर आंदोलन की सफलता इसी में निहित थी कि जाति-भेद की दीवार टूटे और धर्म के नाम पर पूरा हिन्दू समाज एकजुट हो। अशोक जी सिंहल के नेतृत्व में यह चमत्कार भी हुआ। राम मंदिर आंदोलन को न केवल सभी समाज का समर्थन मिला बल्कि राम मंदिर के शिलान्यास की पहली ईंट सभी संतों के आशीर्वाद और उपस्थिति में काशी के एक हरिजन के हाथों से रखवा कर सामाजिक समरसता की नींव को भी मजबूत किया।

 

 

2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जब एक मत से अयोध्या के स्थान को रामजन्मभूमि घोषित कर दिया तो उन्हें अपार हर्ष हुआ। पर उस वह विषय अभी भी न्यायालय में लंबित है। 2014 के चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की मुहिम भी प्रयाग माघ मेले से अशोक जी सिंहल ने शुरु करवाई था।

 

 

धर्म , समाज , सस्कृति , राजनीति , साहित्य , संस्कार-परिवार , गाय-गीता-गंगा समेत देश की जड़ों को मजबूती देने वाली हर प्रथा-परंपरा को अशोक जी सिंघल ने अपना स्वर दिया।  देश के मंदिरों में दलित और पिछड़े पुजारियों की नियुक्ति का अभियान भी अशोक जी ने शुरु किया। दलित और पिछड़ों को वेद पढ़ने के लिए मुहिम चलाई , शंकराचार्यों से सहमति भी दिलवाई। दक्षिण भारत में दलित पुजारियों के प्रशिक्षण का बड़ा काम शुरु करवाया। हिंदुओँ के धर्मांतरण के खिलाफ भी सिंहल ने मोर्चा खोला। वनवासी इलाकों और जनजातियों से जुड़े करीब 60 हजार गांवों में उन्होंने एकल स्कूल खुलवाए। सैकड़ों छात्रावास भी पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक खड़े किए। दुनिया भर के 60 से ज्यादा देशों में इन दिनों विश्व हिंदू परिषद के सेवा कार्य चल रहे हैं। खास तौर पर संस्कृत , वेद की शिक्षा, पुजारियों का पशिक्षण और मंदिरों के रखरखाव पर उनका विशेष आग्रह रहता था । 

 

-  जितेन्द्र तिवारी ।