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पूजा का अर्थ एकान्त में बैठकर भजन करना मात्र नहीं है. निर्धन और निर्बल , वन और पर्वतों में रहने वाले अपने भाइयों की सेवा करना भी पूजा ही है. अमृतलाल ठक्कर ने इसे अपने आचरण से सिद्ध कर दिखाया.   उनका जन्म 29 नवम्बर , 1869 को भावनगर (सौराष्ट्र , गुजरात) में हुआ था. उनके पिता विट्ठलदास ठक्कर धार्मिक और परोपकारी व्यक्ति थे. यह संस्कार अमृतलाल जी पर भी पड़ा और उन्हें सेवा में आनन्द आने लगा. शिक्षा के बाद उन्हें पोरबन्दर में अभियन्ता की नौकरी मिली. वे रेल विभाग के साथ तीन साल के अनुबन्ध पर युगांडा गये. वहां से लौटे तो उनके क्षेत्र में दुर्भिक्ष फैला हुआ था. यह देखकर उनसे रहा नहीं गया और वे इनकी सेवा में जुट गये. यहीं से उनका नाम ‘ ठक्कर बापा ’ पड़ गया.   इसके बाद उन्होंने मुम्बई नगर निगम में काम किया. इस पद पर रहते हुए उन्होंने सफाईकर्मियों के लिए उल्लेखनीय कार्य किये. वर्ष 1909 में पत्नी के देहान्त के बाद निर्धनों की सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर वे मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बसे वनवासियों के बीच काम करने लगे. 

 

 

यह काम करते समय उन्होंने देखा कि वहां विदेशों से आये मिशनरियों ने विद्यालय , चिकित्सालय आदि खोल रखे थे , पर वे वनवासियों की अशिक्षा , निर्धनता , अन्धविश्वास आदि का लाभ उठाकर उन्हें हिन्दू से ईसाई बना रहे थे. बापा ने इस दुश्चक्र को तोड़ने का निश्चय कर लिया. इसके लिए वे हरिकृष्ण देव के साथ ‘ भारत सेवक समाज ’ में सम्मिलित हो गये.   उन्होंने गांधी जी , गोपाल कृष्ण गोखले , देवधर दादा , सुखदेव भाई और श्रीनिवास शास्त्री के साथ भी काम किया , पर राजनीतिक कार्य उनके अनुकूल नहीं थे. इसलिए वे उधर से मन हटाकर पूरी तरह वनवासियों के बीच काम करने लगे. वर्ष 1914 में मुंबई नगर निगम की स्थायी नौकरी छोड़कर वे ‘ सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी ’ के माध्यम से पूरे समय काम में लग गये. 

 

 

वर्ष 1920 में उड़ीसा के पुरी जिले में बाढ़ के समय ठक्कर बापा ने लम्बे समय तक काम किया. वर्ष 1946 में नोआखाली में मुस्लिम गुंडों द्वारा किये गये हिन्दुओं के नरसंहार के बाद वहां जाकर भी उन्होंने सेवाकार्य किये.   वे जिस काम में हाथ डालते , उसका गहन अध्ययन कर विभिन्न पत्रों में लेख लिखकर जनता से सहयोग मांगते थे. उनकी प्रतिष्ठा के कारण भरपूर धन उन्हें मिलता था. इसका सदुपयोग कर वे उसका ठीक हिसाब रखते थे.   ठक्कर बापा जहां भी जाते थे , वहां तात्कालिक समस्याओं के निदान के साथ कुछ स्थायी कार्य भी करते थे , जिससे उस क्षेत्र के लोगों का जीवन उन्नत हो सके. विद्यालय , चिकित्सालय और आश्रम इसका सर्वश्रेष्ठ माध्यम थे.   उन्होंने अनेक स्थानों पर प्रचलित बेगार प्रथा के विरोध में आन्दोलन चलाए. स्वतन्त्रता के बाद जब असम में भूकम्प आया , तब वहां के राज्यपाल के आग्रह पर अपने सहयोगियों के साथ वहां जाकर भी उन्होंने सेवा कार्य किये. 

 

 

वर्ष 1932 में गांधी जी के आग्रह पर वे ‘ हरिजन सेवक संघ ’ के मंत्री बने. घनश्याम दास बिड़ला ने इसका अध्यक्ष पद इसी शर्त पर स्वीकार किया कि ठक्कर बापा इसके मंत्री होंगे. बापा ने भील सेवा मंडल , अन्त्यज सेवा मंडल आदि संस्थाएं बनाकर इन वर्गों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति सुधारने के प्रयास किये. उन्हें सेवा कार्य में ही आनंद आता था. देश में कहीं भी , कैसी भी सेवा की आवश्यकता हो , वे वहां जाने को सदा तत्पर रहते थे. 19 जनवरी , 1951 को भावनगर में अपने परिजनों के बीच महान सेवाव्रती ठक्कर बापा का देहांत हुआ.