इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केन्द्र


राजा महेन्द्र प्रताप सिंह स्वाधीनता सेनानी थे , जिन्होंने विदेशों में रहकर देश की आजादी के लिये प्रयास किये. उनका जन्म मुरसान (हाथरस , उत्तर प्रदेश) के एक प्रसिद्ध जाट राजवंश परिवार में 01 दिसम्बर , 1886 को हुआ था.   वे अपने पिता राजा घनश्याम सिंह के तीसरे पुत्र थे. उनका लालन-पालन और प्राथमिक शिक्षा वृंदावन में हुई. इसके बाद उन्होंने अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज से प्रथम श्रेणी में एमए की परीक्षा उत्तीर्ण की. यही विद्यालय आजकल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कहलाता है. एक बार उन्होंने देखा कि एक प्रदर्शिनी में छोटी सी बात पर एक छात्र की पुलिस वालों से झड़प हो गयी. प्रधानाचार्य ने इस पर उसे तीन साल के लिए विद्यालय से निकाल दिया. इसके विरोध में राजा महेन्द्र प्रताप के नेतृत्व में छात्रों ने हड़ताल कर दी. उस समय राजा महेंद्र प्रताप बीए के छात्र थे. उनके ओजस्वी भाषण से नाराज होकर उन्हें भी विद्यालय से निकाल दिया गया. 

 

 

राजा महेन्द्र प्रताप अपने पिता जी तथा अध्यापक अशरफ अली से बहुत प्रभावित थे , जो हिन्दू धर्म व संस्कृति से प्रेम करते थे. छात्र जीवन में ही उनका विवाह पंजाब के एक राजवंश में हो गया. वर्ष 1906 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में जाने पर उनके ससुर ने उनसे संबंध तोड़ लिये. राजा महेन्द्र प्रताप जब देश भ्रमण पर निकले , तो उन्हें देशवासियों की दुर्दशा और शासन के अत्याचार देखने को मिले. इससे उनका मन बहुत दुखी हुआ. 17 अगस्त , 1917 को उन्होंने विश्व यात्रा के लिए प्रस्थान किया. वे रोम , पेरिस , बर्लिन तथा लंदन गये. इस यात्रा से उनके मन में देश की आजादी की ललक और तीव्र हो गयी. भारत लौटकर उन्होंने अपनी सम्पत्ति से एक विद्यालय की स्थापना की. इसके बाद वे फिर विदेश प्रवास पर चले गए. 

 

 

अगले 31 साल वे जर्मनी , स्विट्जरलैंड , अफगानिस्तान , तुर्की , यूरोप , अमरीका , चीन , जापान , रूस आदि देशों में घूमकर आजादी की अलख जगाते रहे. इस पर शासन ने उन्हें राजद्रोही घोषित कर उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली. दिसम्बर 1915 में उन्होंने विदेश में अपनी अध्यक्षता में भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की. इसमें मौलाना बरकत अली को प्रधानमंत्री बनाया गया. वे भारत की ही नहीं , तो विश्व के हर देश की स्वाधीनता के पक्षधर थे. वर्ष 1925 में उन्होंने न्यूयार्क में नीग्रो लोगों की स्वतंत्रता के समर्थन में भाषण दिया. सितम्बर 1938 में उन्होंने एक सैनिक बोर्ड का गठन किया , जिसमें वे अध्यक्ष , रासबिहारी बोस उपाध्यक्ष तथा आनंद मोहन सहाय महामंत्री थे. 

 

 

द्वितीय विश्व युद्ध में उन्हें बंदी बना लिया गया , पर कुछ नेताओं के प्रयास से वे मुक्त करा लिये गये. अगस्त 1945 में जलयान से चेन्नई पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत हुआ. इसके बाद वे देश में जहां भी गये , देशभक्त जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बैठाया. स्वाधीनता के लिए मातृभूमि से 32 वर्ष दूर रहने तथा अपनी सारी सम्पत्ति होम कर देने वाले ऐसे त्यागी पुरुष के दर्शन करने लोग दूर-दूर से पैदल चलकर आते थे. राजा महेन्द्र प्रताप पंचायती राज को ही वास्तविक स्वाधीनता मानते थे. वे आम आदमी के अधिकारों के समर्थक तथा नौकरशाही के अत्यधिक अधिकारों के विरोधी थे. वर्ष 1957 में मथुरा से लोकसभा के निर्दलीय सदस्य बने. वे ‘ भारतीय स्वाधीनता सेनानी संघ ’ तथा ‘ अखिल भारतीय जाट महासभा ’ के भी अध्यक्ष रहे. 29 अप्रैल , 1979 को उनका देहांत हुआ.