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स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिवस (12 जनवरी) पर विशेष

 

स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म-महासभा में 19 सितंबर 1893 को हिन्दू धर्म पर एक भाषण दिया था , जिसमें उन्होंने वेदान्त दर्शन के उच्च सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था। प्रस्तुत है उसी भाषण का एक अंश

हिन्दू जाति ने अपना धर्म श्रुति- वेदों से प्राप्त किया है। उनकी धारणा है कि वेद अनादि अनंत हैं। श्रोताओं को , सम्भव है , यह बात हास्यास्पद लगे कि कोई पुस्तक अनादि और अनंत कैसे हो सकती है। किन्तु वेदों का अर्थ कोई पुस्तक है ही नहीं। वेदों का अर्थ है भिन्न-भिन्न कालों में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष।  

जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत मनुष्यों के पता लगने के पहले से ही अपना काम करता चला आया था और आज अगर मनुष्यजाति उसे भूल भी जाए तो भी वह नियम अपना काम करता ही रहेगा , ठीक वही बात आध्यात्मिक जगत का शासन करने वाले नियमों के सम्बंध में भी है। एक आत्मा के दूसरी आत्मा के साथ और जीवात्मा के आत्माओं के परमपिता के साथ जो नैतिक तथा आध्यात्मिक सम्बंध हैं , वे उनके आविष्कार के पहले भी थे , और यदि हम उन्हें भूल भी जाएं , तो भी बने रहेंगे।

इन नियमों या सत्यों का आविष्कार करने वाले ' ऋषि ' कहलाते हैं और हम उनको पूर्णत्व तक पहुंची हुई आत्मा मान कर सम्मान देते हैं। यह बतलाते हुए मुझे हर्ष होता है कि इन महानतम ऋषियों में कुछ स्त्रियां भी थीं। यहां यह कहा जा सकता है कि ये नियम , नियम के रूप में अनन्त भले ही हों , पर इनका आदि तो अवश्य ही होना चाहिए। वेद हमें यह सिखाते हैं कि सृष्टि का न आदि है , न अंत। विज्ञान ने हमें सिद्ध कर दिखाया है कि समग्र विश्व की सारी ऊर्जा-समष्टि का परिमाण हमेशा एक-सा रहता है। तो फिर , यदि ऐसा कोई समय था , जब किसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं था , उस समय सम्पूर्ण ऊर्जा कहां थी ? कोई कोई कहते हैं कि ईश्वर में ही वह सब अव्यक्त रूप में निहित थी।  

तब तो ईश्वर कभी अव्यक्त और कभी व्यक्त है ; इससे तो वह विकारशील हो जाएगा। प्रत्येक विकारशील पदार्थ यौगिक होता है और हर यौगिक पदार्थ में वह परिवर्तन अवश्यम्भावी है , जिसे हम विनाश कहते हैं। इस तरह तो ईश्वर की मृत्यु हो जाएगी , जो अनर्गल है। इसलिए ऐसा समय कभी नहीं था , जब यह सृष्टि नहीं थी। मैं एक उपमा दूं: स्रष्टा और सृष्टि मानो दो रेखाएं हैं , जिनका न आदि है , न अंत , और जो समानांतर चलती हैं। ईश्वर नित्य क्रियाशील विधाता है , जिसकी शक्ति से प्रलयपयोधि में से नित्यश: एक के बाद एक ब्रह्मांड का सृजन होता है , वे कुछ काल तक गतिमान रहते हैं , और उसके बाद वे पुन: विनष्ट कर दिए जाते हैं। ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' अर्थात् इस सूर्य और इस चंद्रमा को विधाता ने पूर्व कल्पों के सूर्य और चंद्रमा के समान निर्मित किया है- इस वाक्य का नित्य पाठ प्रत्येक हिन्दू बालक   प्रतिदिन करता है।

यहां पर मैं खड़ा हूं और अपनी आंखें बंद करके यदि मैं अपने अस्तित्व- ' मैं ', ' मैं ', ' मैं ' को समझने का प्रयत्न करूं , तो मुझमें किस भाव का उदय होता है ? इस भाव का कि मैं शरीर हूं। तो क्या मैं भौतिक पदार्थों के संघात के सिवा और कुछ नहीं हूं ? वेदों की घोषणा है- ' नहीं , मैं शरीर में रहने वाली आत्मा हूं , मैं शरीर नहीं हूं। शरीर मर जाएगा , पर मैं नहीं मरूंगा। मैं इस शरीर में विद्यमान हूं और जब इस शरीर का पतन होगा , तब भी मैं विद्यमान रहूंगा ही। मेरा एक अतीत भी है। ' आत्मा की सृष्टि नहीं हुई है , क्योंकि सृष्टि का अर्थ है- भिन्न-भिन्न द्रव्यों का संघात , और इस संघात का विघटन अवश्यम्भावी है। अतएव यदि आत्मा का सृजन हुआ , तो उसकी मृत्यु भी होनी चाहिए।  

कुछ लोग जन्म से ही सुखी होते हैं। दूसरे कुछ लोग जन्म से ही दुखी होते हैं , और येन-केन-प्रकारेण अपने दुखमय जीवन के दिन काटते हैं। ऐसा क्यों ? यदि ये सभी एक ही न्यायी और दयालु ईश्वर ने उत्पन्न किए हों , तो फिर उसने एक को सुखी और दूसरे को दुखी क्यों बनाया ? ईश्वर ऐसा पक्षपाती क्यों है ? फिर ऐसा मानने से भी बात नहीं सुधर सकती कि जो इस वर्तमान जीवन में दुखी हैं , वे भावी जीवन में पूर्ण सुखी रहेंगे। न्यायी और दयालु ईश्वर के राज्य में मनुष्य इस जीवन में भी दुखी क्यों रहे ?
दूसरी बात यह है कि सृष्टि-उत्पादक ईश्वर को मान्यता देने वाला सिद्धांत वैषम्य की कोई व्याख्या नहीं करता , बल्कि वह तो केवल एक सर्वशक्तिमान पुरुष का निष्ठुर आदेश ही प्रकट करता है। अतएव इस जन्म के पूर्व ऐसे कारण होने ही चाहिए , जिसके फलस्वरूप मनुष्य इस जन्म में सुखी या दुखी हुआ करता है। और ये कारण हैं , उसके ही पूर्वानुष्ठित कर्म।

क्या मनुष्य के शरीर और मन की सारी प्रवृत्तियों की व्याख्या उत्तराधिकार से प्राप्त क्षता द्वारा नहीं हो सकती ? यहां जड़ और चैतन्य (मन) , सत्ता की दो समानांतर रेखाएं हैं ? यदि जड़ और जड़ के समस्त रूपांतर ही , जो कुछ यहां है , उसके कारण सिद्ध हो सकते तो फिर आत्मा के अस्तित्व को मानने की कोई आवश्यकता ही न रह जाती। पर यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि चैतन्य (विचार) का विकास जड़ से हुआ है , और यदि कोई दार्शनिक अद्वैतवाद अनिवार्य है तो आध्यात्मिक अद्वैतवाद निश्चय ही तर्कसंगत है और भौतिक अद्वैतवाद से किसी प्रकार कम वांछनीय नहीं ; परंतु यहां इन दोनों की जरूरत नहीं।

हम यह अस्वीकार नहीं कर सकते कि शरीर कुछ प्रवृत्तियों को आनुवंशिकता से प्राप्त करता है ; किंतु ऐसी प्रवृत्तियों का अर्थ केवल शारीरिक रूप-आकृति है , जिसके माध्यम से केवल एक विशेष मन एक विशेष प्रकार से काम कर सकता है। आत्मा की कुछ ऐसी विशेष प्रवृत्तियां होती हैं , जिनकी उत्पत्ति अतीत के कर्म से होती है। एक विशेष प्रवृत्ति वाली जीवात्मा ' योग्यं योग्येन युज्यते ' इस नियमानुसार उसी शरीर में जन्म ग्रहण करती है , जो उस प्रवृत्ति के प्रकट करने के लिए सबसे उपयुक्त आधार हो। यह विज्ञानसंगत है , क्योंकि विज्ञान हर प्रवृत्ति की व्याख्या आदत से करना चाहता है , और आदत प्रवृत्तियों से बनती है। अतएव नवजात जीवात्मा की नैसर्गिक आदतों की व्याख्या के लिए आवृत्तियां अनिवार्य हो जाती हैं। और चूंकि वे प्रस्तुत जीवन में प्राप्त नहीं होतीं , अत: वे पिछले जीवन से ही आई होंगी।

एक और दृष्टिकोण है। ये सभी बातें यदि स्वयंसिद्ध भी मान लें तो मैं अपने पूर्व जन्म की कोई बात स्मरण क्यों नहीं रख पाता ? इसका समाधान सरल है। मैं अभी अंग्रेजी बोल रहा हूं। वह मेरी मातृभाषा नहीं है। वस्तुत: इस समय मेरी मातृभाषा का कोई भी शब्द मेरे चित्त में उपस्थित नहीं है ; पर उन शब्दों को सामने लाने का थोड़ा प्रयत्न करते ही वे मेरे मन में उमड़ आते हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि चेतना मानवसागर की सतह मात्र है और भीतर , उसकी गहराई में , हमारी समस्त अनुभवराशि संचित है। केवल प्रयत्न तथा उद्यम कीजिए , वे सब ऊपर उठ आएंगे। और आप अपने पूर्व जन्मों का भी ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे।  

    
( स्वामी विवेकानंद साहित्य संचयन से साभार)