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आज जब केंद्र व राज्य की सरकारें मिलकर एड़ी-चोटी का जोर लगाती हैं , तब भी एक विश्वविद्यालय का निर्माण कई बरस तक अटका और लटका रहता है। ऐसे में , यह कल्पना थोड़ी कठिन है कि कैसे सौ साल पहले महज एक व्यक्ति के संकल्प और प्रयास ने विश्व-स्तरीय शिक्षा केंद्र को स्थापित किया होगा। वह भी ऐसे व्यक्ति ने , जिनकी जेब खाली थी और उनकी कुल जमा पूंजी महात्मा गांधी द्वारा दी गई ‘ भिखारियों का राजा ’ की उपाधि थी। अपनी इसी प्रसिद्धि के बल पर मदन मोहन मालवीय ने जब धन जुटाना शुरू किया , तो काशी हिंदू विश्वविद्यालय का निर्माण कार्य फिर कभी नहीं रुका। विश्वविद्यालय के इस सपने के अंकुर 23 साल के युवक मदनमोहन मालवीय के हृदय और मस्तिष्क में जब अंकुरित हो रहे थे , तब शायद उस समय के शिक्षाविदों और समाज-प्रतिबद्ध लोगों ने भी नहीं सोचा होगा कि विचार और संकल्प का यह अंकुर एक विशाल और ऐतिहासिक वट-वृक्ष का रूप ले लेगा। ऐसा वट-वृक्ष , जिसे पूरी दुनिया हसरत से देखेगी।

 

काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव चार फरवरी , 1916 को बनारस (अब वाराणसी) में रखी गई थी। लेकिन इसे मूर्त रूप देने का काम मदन मोहन मालवीय ने 12 साल पहले ही शुरू कर दिया था। उन्होंने इसके लिए 1904 में काशी नरेश महाराजा प्रभु नारायण सिंह को अध्यक्ष बनाकर काम शुरू कर दिया था। दो साल बाद प्रयाग कुंभ के अवसर पर उन्होंने विश्वविद्यालय के लिए एक करोड़ रुपये के योगदान की अपील की। योगदान आने भी लगा। भारतविद एनी बेसेंट ने हिंदू कॉलेज और दरभंगा के महाराजा कामेश्वर सिंह ने सनातन धर्म विश्वविद्यालय की अपनी योजनाएं मालवीय जी के प्रस्तावित विश्वविद्यालय को समर्पित कर दीं। मालवीय जी यहीं नहीं रुके। तिनका-तिनका जोड़कर , देश के कोने-कोने में घूम-घूमकर दानशील राजे-रजवाड़ों , रईसों से कौड़ी-कौड़ी इकट्ठा करके इस महान शिक्षा संस्था की कल्पना को मूर्त रूप दिया। रईस , पैसे वाले ही नहीं , ‘ गरीब-गुरबा ’ कहे जाने वाले मजदूर , ठेलागाड़ी चलाने वाले भी पीछे नहीं रहे। सभी ने मालवीय जी के विश्वविद्यालय की चादर में कुछ-न-कुछ योगदान किया। जिसने एक-दो रुपये दिए या कुछ सिक्के भी डाले , सभी का स्वागत था। मालवीय जी के इस ‘ ज्ञान यज्ञ ’ में सभी ने आहुति डाली। वह चादर में ही धन एकत्र करते , क्योंकि उन्होंने संकल्प लिया था कि वह इस धन को छुएंगे नहीं।

 

विश्वविद्यालय के लिए मालवीय जी ने सिर्फ आर्थिक साधन नहीं जुटाए। जिनकी धरोहर ज्ञान की पूंजी थी , ऐसे विद्वानों को वह देश भर से चुन-चुनकर लाने में सफल रहे। सफल इसलिए भी कि उन विद्वानों को देने के लिए उनके पास कुछ खास नहीं था। थोड़ा-बहुत मानदेय पाकर भी मालवीय जी के सान्निध्य में ये विद्वान विश्वविद्यालय की लंबी विद्वत परंपरा का अमिट इतिहास रच गए। इसे उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल प्रोफेसर विष्णुकांत शास्त्री की बात से ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकता है- ‘ मेरे पिता पंडित गांगेय नरोत्तम शास्त्री को महामना मालवीय जी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बुला लिया था। मालवीय जी के आह्वान पर मेरे पिताजी ने घरवालों की भी एक न सुनी और महामना के चरणों में चले आए। उन दिनों विश्वविद्यालय के अध्यापकों को , कहें तो , कुछ भी नहीं मिलता था। आज की तरह सेवा-शर्ते और सुविधाएं नहीं थीं। मेरे पिताजी 125 रुपये पर यहां कार्यरत रहे और कहते रहे कि गंगा स्नान , विश्वनाथ जी और मालवीय जी का सान्निध्य कभी न छूटे। इनकी जगह पर पैसा क्या होता है ?’

 

महामना मालवीय इस विश्वविद्यालय को आधुनिकतम विषयों के साथ-साथ भारतीय विद्या के वैश्विक केंद्र के रूप में देखना चाहते थे। उस समय तक मद्रास , लाहौर , कलकत्ता , इलाहाबाद और बंबई विश्वविद्यालय स्थापित हो चुके थे। इन सभी से अलग भारतीय पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान के साथ ही आधुनिकतम विषयों के पठन-पाठन के केंद्र के रूप में इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

 

वाराणसी में गंगा के पश्चिमी तट पर करीब 1,300 एकड़ में फैला विश्वविद्यालय परिसर अपने आप में अनूठा और दर्शनीय है। काशी महाराज प्रभु नारायण सिंह ने परिसर के लिए विस्तृत भूखंड दान में दिया था। 100 साल पहले आज ही के दिन महात्मा गांधी की उपस्थिति में तत्कालीन गवर्नर-जनरल ने गंगा के तट पर सुरम्य वातावरण में इस विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी। आगे वसंत पंचमी को शिलान्यास के धार्मिक विधान संपन्न हुए। बाद में 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स ने विश्वविद्यालय का औपचारिक रूप से शुभारंभ-उद्घाटन किया। उद्घाटन के अवसर पर देश के सैकड़ों राजा-महाराजा , रईस , जमींदार और दानी एकत्र हुए थे। सभी ने इस विश्वविद्यालय के निर्माण में कुछ-न-कुछ योगदान किया था।

 

शिक्षा के जिस समावेशी (होलिस्टिक) मॉडल की आज विश्वव्यापी मांग और चर्चा है , उसे 100 साल पहले ही इस विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित किया जाना , एक भविष्यद्रष्टा की राष्ट्र को अमूल्य देन है। प्राचीन ज्ञान की विरासत के साथ ही आधुनिक वैज्ञानिक सोच सहित ‘ संपूर्ण मानव विकास ’ ( टोटल ह्यूूमन डेवलपमेंट) की अवधारणा के सभी साधन यहां उपलब्ध हैं। अपने अस्तित्व के 100 साल बाद भी यह विश्वविद्यालय भारतीय गुरुकुल परंपरा , नालंदा-तक्षशिला की ज्ञान परंपरा और भारतीय मनीषा का विलक्षण केंद्र है।

 

वर्तमान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय है। छात्र-छात्रओं के लिए अत्यंत कम शुल्क और उत्कृष्ट आधारभूत संरचना इस विश्वविद्यालय की विशेषता है। विश्वविद्यालय का एक और विस्तृत परिसर लगभग 60 किलोमीटर दूर बरकछा (मिर्जापुर) में है। इसके चार संस्थान , 16 संकाय और 139 विभाग विभिन्न विषयों के शोध , शिक्षण , प्रशिक्षण कार्य में सक्रिय हैं। यहां एक समय में 30 हजार से अधिक विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते हैं और उन्हें पढ़ाने के लिए लगभग 2,000 शिक्षक हैं। देश ही नहीं , दुनिया भर में फैले यहां के छात्र इसके सामर्थ्य का सबसे अच्छा परिचय हैं। इसके लिए एक उदाहरण ही काफी होगा कि देश के लगभग 50 विश्वविद्यालयों को काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने कुलपति दिए हैं। इस उदाहरण से यह भी समझा जा सकता है कि मानव निर्माण-राष्ट्र निर्माण , यानी ‘ मैन मेकिंग ऐंड नेशन बिल्डिंग ’ के अपने लक्ष्य को इस विश्वविद्यालय ने किस हद तक सार्थक किया है।

 

शायद इसीलिए जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलगीत में इसे ‘ सर्वविद्या की राजधानी ’ कहा जाता है , तो किसी को हैरत नहीं होती। महामना मालवीय को ‘ सिलवर टंग ओरेटर ’ कहा जाता था , क्योंकि उनकी वाणी में अमृत था। वह अजातशत्रु थे , जो समय की शिला पर इस विश्वविद्यालय की अमिट रेखा खींच गए। आने वाली कई सदियों तक यह भारतीय ज्ञान-विज्ञान परंपरा की जीवन-रेखा बनी रहेगी।

 

(लेखक राम मोहन पाठक, मालवीय पत्रकारिता संस्थान, काशी विद्यापीठ के पूर्व निदेशक हैं)