इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केन्द्र


समय बदलता है | लेकिन कई बार इसकी मियाद इतनी बड़ी होती है कि बदलाव की सूरत दिखती नहीं | कहीं से कोई आवाज सुनाई भी पड़ती है तो लोग अपने अतीत के खौफ और जख्म के निशान देखने लगते हैं | ऐसा ही कुछ हो रहा इन दिनों कश्मीरी पंडितों और मुस्लिम जनसंख्या बढ़ोत्तरी को लेकर हो रही राजनीति पर | कश्मीर में पंडित बेघरबार हो गये उनका दर्द भारत की पूर्ववर्ती सरकारों ने शायद ही समझा |

आज मोदी सरकार में गृहमंत्री राजनाथ सिंह और अन्य नेताओं ने इसपर बोलना शुरू किया है | ये बीजेपी की मोदी सरकार की पीठ थपथपाने वाली बात नहीं है , आप कहेंगे कि कश्मीर पंडितों और मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या में क्या तारतम्य है ? तारतम्य है | इसकी कड़ियां एक दूसरे से जुड़ी दिखती हैं , जिसे इस्लाम रूपी धर्म का सीमेंट जोड़ने का काम करता दिख रहा है | पहली बात , कश्मीर से भगाए गये , पंडितों  की जुबान अतीत को बयां करते हुए लड़खड़ा जाती है , आंसू छलक आते हैं , हृदय हलफ जाता है , उस वाकये को बयां करते हुए |

पांच लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितों को ‘ विस्थापित ’ का नाम दे दिया गया , कश्मीर से बाहर कर दिया गया , उनके घरों के साथ-साथ उनके घर की इज्जत-आबरू के साथ खिलवाड़ किया गया | अगर कश्मीरी पंडित ‘ विस्थापित ’ हुए तो विस्थापन से रोकने की कोशिश हुई क्या ? इसका जबाव देने के लिए कौन आएगा ? कहने की जरूरत नहीं कि ये दर्द उन कट्टर इस्लामिक गुटों ने दिये थे जो आज भी राज्य की स्थिरता और धारा- 370 हटाने का विरोध करते हैं | धारा 370 हटाने का विरोध करने वाले कौन हैं ? समय बदल गया है , सूरत बदल गई है , आवश्यकताएं और देश की आकांक्षाएं बदल गयी हैं |

तुष्टिकरण की राजनीति का ही परिणाम था कि कश्मीर जैसे जन्नत को छोड़कर लोगों को बाहर आना पड़ा और किसी भारत की सरकारें इसमें सबकुछ जानते-समझते हुए भी हस्तक्षेप नहीं कर सकीं | जरा उन लोगों से पूछा जाए कि जो लोग कश्मीर से बाहर गए | क्या उनका कश्मीर नहीं था ? जब वो भारत के विभिन्न प्रांतों में शरण लिए तो क्या भारत की भलमनसाहत की कीमत उसे नहीं मिलनी चाहिए ? कश्मीर के तत्कालीन राजा हरिसिंह को भी पाकिस्तान से डर था | क्या वो डर आज पाकिस्तान से नहीं है ? भारत आज भी कश्मीर की रक्षा कर रहा है तन-मन-धन से | पाकिस्तान-परस्त कट्टर आतंकवादियों और अलगाववाद के बीच के भारत पिस रहा है , शांति की अपेक्षा धरी की धरी रह गयी है! कश्मीरी पंडितों का मसला क्या कश्मीर में लोकतंत्र की आड़ में समानान्तर इस्लाम की कट्टरपंथ का नतीजा नहीं ? कोई आपसी क्लेश नहीं चाहता , लेकिन सनातन धर्मावलम्बियों की सहिष्णुता की अग्निपरीक्षा आज भी जारी है | क्यों ?

आंतकवाद का साये में डूबे कश्मीर में इस्लाम का अक्श दुनिया को दिखता है | कश्मीर को अलग करने की मांग होती है | स्वायत्त कश्मीर की मांग होती है क्यों ?  कश्मीरी पंडितों को बाहर निकालकर ये मांग क्यों ? क्या ये इस्लामिक राज्य गठन की कोशिश नहीं ? ये परिणाम इस्लामिक कट्टरता और तुष्टिकरण भर का नहीं , बल्कि ये सारा खेल उस जनसंख्या की प्रतिस्पर्धा का है , जो भारत में भी इस्लाम धर्मावलम्बियों की तरफ से जारी रखा गया है | देश की जनसंख्या वृद्धि पर रोक नहीं होना , उसका दूसरा पहलू है |

अजीब-सी बात है देश के विकास में सबके सहयोग की बात की जाती है ,  सबके लिए कानून बराबर होने की बात की जाती है , बराबरी से रोजगार पाने और जीने का हक मिला हुआ है , संविधान से सबके बंधे होने की बात की जाती है. लेकिन जनसंख्या जैसे संवेदनशील मसले पर उदासीनता क्यों ? भारत के गणतंत्र है , लोकतांत्रिक देश है , धार्मिक देश नहीं | धर्मनिरपेक्ष देश है , धर्मनिरपेक्षता के नाम पर फिर इस्लामिक धर्मावलम्बियों को ऐसी छूट क्यों ? क्या जनसंख्या नियंत्रण में उनका भारत में कोई योगदान नहीं होना चाहिए ? जाहिर है इसपर नेताओं को उनकी राजनीति बोलने नहीं देती , लेकिन ऑफ द रिकॉर्ड बहुत बातें होती हैं ?

धर्म अपनी जगह है , देश अपनी जगह | राजनीति और रोजगार हर चीज में उन्हें बराबर का हक है , आरक्षण का सुख भी है , फिर वो देश की जनसंख्या नियंत्रण में सहयोग क्यों नहीं करते ? अपने बच्चों , कल की पीढ़ी के सुनहरे भविष्य को लेकर क्या उन्हें चिन्ता नहीं होनी चाहिए ? फिर वो किस मुंह से गरीबी के भंवर में फंसे होने का हवाला देते हैं ? दुनिया कह रही है कि ‘ छोटा परिवार सुखी परिवार ’, ‘ बच्चे दो ही अच्छे ’, भारत सरकार ऐसे नारे देती रही है | प्रचार पर लाखों – करोड़ों खर्च करती है | ‘ हम दो हमारे दो , मम्मी पापा के हम दो ’, ऐसे नारे के बाद अब तो नारे में यहां तक बदलाव आ गया है कि ‘ हम दो , हमारे एक ’| ऐसे में जनसंख्या का बोझ बढ़ाने से मुसलमानों को रोकना नहीं चाहिए ?

हमारा मकसद उनकी धार्मिक आस्था पर चोट पहुंचाना नहीं बल्कि उस परम्परावादी रुढ़िवादिता की तरफ इशारा करना है , जिसमें वो जकड़े हैं | आज भी इस्लाम धर्मावलम्बियों में देखा गया कि जो लोग ऊंचे ओहदे पर पहुंच गये हैं , वो आगे बढ़ते जा रहे हैं , लेकिन बाकी की तरफ उनका ध्यान भी नहीं जाता , वो सरकारों का मुंह ताकने की तरफ इशारा करते हैं और यहीं से शुरू हो जाती है राजनीति |

परिवार में बच्चों का बढ़ता बोझ , भारत के कई समाज में चिन्ता का कारण बना है | मुस्लिम समुदाय में भी इस बात की चिन्ता है , लेकिन , वो ‘ जंजीर ’ में जकड़े हैं | हैरानी की बात है , भीख मांगने से लेकर वो फुटपाथ पर अतिक्रमण कर व्यवसाय करने तक का काम करते हैं ,  बालमजदूरी में भी वो लगे हैं | होश संभाला नहीं कि वो ठेले लेकर चार पैसे कमाने निकल पड़ते हैं | कबाड़ी से लेकर कसाब तक का काम करते हैं | हमने तो यहां तक देखा कि कई पिता अपने बच्चों से भीख मांगवाते हैं | हद तो तब हो गयी जब अच्छे खासे हाथ-पैर वाले भीख मांगते हैं , वो भी अनोखे अंदाज में | एक ठेले पर एक दम्पत्ति सोया रहता है , एक व्यक्ति उस ठेले को खींचता है. साइन बोर्ड के साथ माइक से अनाउंसमेंट होता है- “ इनकी बेटी का ब्याह करना है , बहुत गरीब हैं , कोई मदद कर दें , परवरदिगार आपको बरकत देगा |” ऐसा अन्य समुदाय में शायद ही देखा गया हो , जो अपनी बेटी की शादी के लिए भीख मांगता हो | अपनी हैसियत के मुताबिक वो अपनी बेटी की शादी करता है , लेकिन , ऐसा एक भी किस्सा अगर मुस्लिम समुदाय से आता है , तो ऐसा क्यों है ? साफ है जनसंख्या का बोझ समझ कर भी नासमझ बने रहने का ये परिणाम है |

ऐसे कई लोग हैं जो महानगरों में रहते हैं , लेकिन , गुजारे के लिए एक कमरा होता है , झुग्गियों में रहने की बेबसी होती है , एक कमरे में 7-8 बच्चे होते हैं और मां-बाप अलग. ऐसी मजबूरी क्यों ?

धर्म की आड़ में जनसंख्या का बोझ कम करने की कोशिश मुस्लिम समुदाय की तरफ से नहीं की जा रही | स्वेच्छा से मुस्लिम समुदाय ऐसा नहीं कर रहा तो ये चिन्ता का विषय है | ऐसे सवाल कुछ संत और नेता उठाते रहे हैं , जिन्हें मुसलमान विरोधी बता दिया जाता है , उनकी गिरफ्तारी की मांग की जाने लगती है |

इस्लामिक कट्टरपंथी एक तरफ कश्मीर से वहां के वाशिंदे पंडितों को भगाते हैं , कट्टरता के नाम पर लोगों को भड़काता है | स्त्री शिक्षा के प्रति नकारात्मक रवैया बरता जाता रहा है | बिहार , उत्तरप्रदेश या फिर आईटी सिटी हैदराबाद समेत देश के अन्य राज्य वहां मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा का स्तर जान लीजिए पता चल जाएगा इस समुदाय के पिछड़ेपन का कारण |

एक स्त्री को शिक्षित करने का मतलब होता है कि एक परिवार को शिक्षित करना | जाहिर है , स्त्री को शिक्षा से रोकर कर मुसलमान कट्टरपंथी अपनी दुकान चला रहे हैं | 30 करोड़ से ज्यादा की आबादी आजादी के बाद बढ़ी है , फिर भी कम लगती है उन्हें. जनसंख्या का बोझ आखिर क्यों बढ़ाना चाहते हैं मुसलमान कट्टरपंथी ? हैरानी की बात है कि देश में प्रशासनिक अमला भी दोहरी नीति अपनाता है | फसल नुकसान से हुई किसानों की मौत पर अधिक बच्चों का हवाला देता है , लेकिन , किसी मुस्लिम के घर की बदहाली की तरफ वो देखता भी नहीं , कुछ नहीं बोलता | क्या है इस्लामिक कट्टरता के इस रूप का निदान ? अनेकता में एकता की परिभाषा आज देश में चिढ़ाती है लोगों को |

पच्चीस साल से निर्वासित जीवन जीने को विवश कश्मीरी पंडितों के दर्द की टीस ठीक उसी तरह से है जैसी कि देश पर बढ़ता मुसलमानों की जनसंख्या का बोझ | कहते हैं मजहब नहीं सिखाता , आपस में बैर रखना | फिर ये कैसा मजहब है जो अपने सिवा दूसरे को दोयम नजरिये से देखता है ?

परन्तु सावधान , ये मजहब नहीं , बल्कि कुछ इस्लामिक कट्टरपंथी हैं , जो धर्मभीरू हैं , जो खुद डरे हैं और दूसरों को डरा कर अपने उल्लू सीधे कर रहे हैं |

( लेखक राजीव रंजन विद्यार्थी वरिष्ठ पत्रकार हैं)