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मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अस्तित्व के संकट के मुहाने पर खड़ी है. ऐसे समय में क्या सीताराम येचुरी का नेतृत्व इसे उबार पाएगा ? इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या माकपा भारत की सामाजिक वास्तविकताओं को स्वीकार करने को तैयार है. नवगठित सेंट्रल कमेटी और पोलित ब्यूरो से तो ऐसा संकेत नहीं मिलता है. देश की सामाजिक , आर्थिक परिस्थितियां वाम राजनीति के अनुकूल हैं , लेकिन वाम ताकतें लगातार कमजोर होती जा रही हैं. इसके बावजूद कि भारत जैसे देश में जन प्रतिनिधि का जीवन और रहन-सहन कैसा होना चाहिए इसका आदर्श उदाहरण वाम सांसद उपस्थित करते हैं. फिर वाम ताकतें संसदीय राजनीति में क्यों सिमटती जा रही हैं ? पिछले 80 साल में वाम दल सिद्धांत और व्यवहार में संतुलन क्यों नहीं बिठा पाए. इस विषय पर विमर्श से पहले एक सवाल है कि मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अपने को साम्यवादी कहने से हिचकती क्यों है ? क्यों वह बार-बार वाम ताकतों की बात करती है , साम्यवाद की नहीं ? दरअसल यह माकपा की कमजोरी का प्रमाण है. क्योंकि देश में साम्यवादी ताकतें कमजोर नहीं हुई हैं. उनका प्रभाव क्षेत्र तो छत्तीसगढ़ , झारखंड , ओडिशा , आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश , बिहार और उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ है. दरअसल कमजोर तो संसदीय साम्यवादी ताकतें हुई हैं. वास्तविकता यह है कि माकपा का बुजरुआकरण हो गया है.

संसदीय साम्यवाद नाकाम क्यों हो गया. क्यों वह ढाई प्रदेशों (पश्चिम बंगाल , केरल और त्रिपुरा) के बाहर अपनी प्रभावी संसदीय उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाया. इसका सबसे बड़ा कारण है कि कम्युनिस्ट पार्टियों ने इस देश के समाज की वास्तविकता को कभी स्वीकार नहीं किया. कार्ल मार्क्‍स राष्ट्रवाद के समर्थक नहीं थे , लेकिन देश प्रेम या देशानुराग के विरोधी नहीं थे. विडंबना देखिए कि जिस पार्टी के अखबार का नाम पैटियॉट था वह भारत विरोधी हर बात को स्वीकार करने को हमेशा तैयार रही. भारत के साम्यवादी जो कुछ भी भारतीय था उसके खिलाफ रहे. फिर वह धर्म हो , जाति व्यवस्था या दूसरे सामाजिक सरोकार. वे भारतीय समाज से कभी समरस नहीं हो पाए. वे भारत की जमीन पर विदेशी बन गए. हिंदू विरोध के नाम पर वे इस्लामी आतंकवाद के समर्थन की हद तक चले गए. इजरायल के विरोध के नाम पर मुसलिम कट्टरवाद का समर्थन करने को तैयार हो गए. 1947 में पाकिस्तान का समर्थन के लिए ‘ अधिकारी थीसिस ’ आई कि मुसलमान कमजोर बुजरुआ है और हिंदू ताकतवर बुजरुआ. भारतीयता का विरोध भारतीय साम्यवादियों के संस्कार में आ गया.

भारतीय समाज से समरस न हो पाने के अलावा भी साम्यवादियों की समस्या रही. माकपा का नेतृत्व अंग्रेजीदां , उच्च वर्गीय , उच्च वर्णीय , अभिजात्य और दिल्ली केंद्रित रहा. पार्टी के नेतृत्व में समाज के वंचित वर्ग के लिए कोई जगह नहीं बन पाई. दलित , आदिवासी , महिला , किसान , मजदूर और काफी हद तक मुस्लिम भी नेतृत्व में जगह पाने में नाकाम रहे. इन वर्गो से किसी ने उभरने की कोशिश की तो उसे दबा दिया गया , बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. केरल की गौरी अम्मा इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. पश्चिम बंगाल की एक चौथाई आबादी आदिवासियों की है , लेकिन प्रदेश के नेतृत्व में उनकी हिस्सेदारी न के बराबर है. साम्यवादियों की समस्या ही यह रही है कि वे सिद्धांत की किताब से बाहर नहीं निकल पाए. एक समय उनके बारे में कहा जाता था कि किसी साम्यवादी को तार्किक ढंग से कोई मुद्दा समझाया जाए तो मान लेते थे कि बात तो सही है. सवाल होता था कि फिर समस्या क्या है. तो जवाब मिलता था कि कॉमरेड बात तो सही है लेकिन थ्योरी में फिट नहीं होती. थ्योरी में फिट करने के चक्कर में माकपा जमीनी सच्चाई से कटती गई. पार्टी मजदूरों के हित की बात करती रही , लेकिन असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में पैठ बनाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की , जो कुल कामगारों का करीब 96 फीसद हैं.

पश्चिम बंगाल में सत्ता में आने के लिए पार्टी ने ऑपरेशन बर्गा के जरिये एक बड़ा काम किया. इसी तरह केरल में सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना जगाने का काम किया. उसके बाद माकपा कोई बड़ा काम करने में नाकाम रही. वह देश में आए सामाजिक और आर्थिक बदलाव को भी स्वीकार करने या बदली परिस्थितियों के मुताबिक बदलाव के लिए तैयार नहीं हुई. आर्थिक नीतियों के मामले पर उसका रवैया दोहरा रहा. दिल्ली में उसके नेता जो बोलते हैं कोलकाता पहुंचकर वह बदल जाता है. पूंजीवाद के रास्ते पर चल रहे चीन को वह आज भी कम्युनिस्ट मानती है. दरअसल 1985 के बाद माकपा का कोई एजेंडा ही नहीं रहा. हरकिशन सिंह सुरजीत हों या प्रकाश करात दिल्ली में बैठकर वे बुजरुआ राजनीति का समायोजन करते रहे. इस सबके बावजूद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तुलना में माकपा ने न्यूनतम नैतिक ईमानदारी बनाए रखी. सत्ता के लिए सिद्धांत से समझौता नहीं किया. उनमें एक लौह तत्व तो है. ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देना उसका प्रमाण है. विचारधारा उनके डीएनए में है. उसी का नतीजा है कि पश्चिम बंगाल में 34 साल तक लगातार सत्ता में रहने के बावजूद उसके किसी नेता का नाम किसी घपले-घोटाले से नहीं जुड़ा. यह कोई सामान्य बात नहीं है. दूसरे राजनीतिक दलों के लिए यह आईना है. उसके सांसदों की जीवनशैली से शायद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों को भी रश्क होता होगा. संघ की इच्छा रही कि जनसंघ और भाजपा के नेताओं की जीवनशैली ऐसी ही हो. यह अलग बात है कि संघ के पदाधिकारी खुद ऐसे नहीं रह पाए. चुनावी राजनीति में रहकर भी भ्रष्टाचार के कीचड़ से अलग रहा जा सकता है , माकपा के जन प्रतिनिधि उसका उदाहरण हैं.

सवाल घूम-फिर कर फिर वहीं आ जाता है कि क्या सीताराम येचुरी बदली वैश्विक परिस्थितियों में माकपा की विश्वदृष्टि को बदल पाएंगे या बदलना चाहेंगे. क्यों कोई अरविंद केजरीवाल , मुलायम सिंह , नीतीश या कई बार एक हद तक इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी माकपा से ज्यादा वामपंथी हो जाते हैं ? भारत के साम्यवादी वामपंथ की डगर पर भी क्यों पीछे छूट जाते हैं. सीताराम येचुरी और उनके साथियों को सोचना चाहिए.

( लेखक प्रदीप सिंह वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

(स्रोत : दैनिक जागरण)