इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केन्द्र


लम्बे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के विरोधियों द्वारा यह प्रयास किया गया है कि संघ को एक दलित विरोधी तथा ब्राह्मणवादी संगठन के रूप में प्रस्तुत किया जाए। इन प्रयासों में हाल ही के दिनों में खासी तेजी आई है लेकिन वास्तव में असलियत क्या है ?

 

संघ से प्रेरित संगठनों द्वारा इस समय देश में 1 लाख 60 हजार से अधिक सेवा कार्य चल रहे हैं जिनसे लाभान्वित होने वाले अधिकांश लोग दलित वर्ग से संबंध रखते हैं। वास्तव में इन सेवा कार्यों को करते समय इन संगठनों द्वारा मुख्य बल समाज के अपेक्षाकृत कमजोर वर्ग को और सबल बनाने पर है फिर उसकी जाति कोई भी हो सकती है। वह दलित भी हो सकता है , वनवासी भी अथवा गरीब ब्राह्मण या क्षत्रिय भी। जाति देखकर नहीं जरूरत देखकर लाभ पहुंचाने के सिद्धांत पर संघ व उससे प्रेरित विवधि संगठन काम करते हैं। ऐसे संगठनों की संख्या 50 से अधिक है और वे देश के सबसे दुर्गम इलाकों में वंचित वर्ग के लिए बिना किसी शोर-शराबे के काम कर रहे हैं।

   

संविधान निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले दलितों के प्रखर नेता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर पूना में 1939 में आरएसएस के एक शिविर में गए थे और वहां यह देखकर प्रभावित हुए थे कि संघ में जाति को कोई महत्व नहीं दिया जाता है। संघ के शिविरों में सभी एक साथ रहते हैं , भोजन करते हैं , खेलते-कूदते हैं और अन्य सभी गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं। वास्तव में संघ की शाखाओं में भी स्वयसंवकों के उपनाम का प्रयोग नहीं किया जाता है। सभी स्वयंसेवकों के पहले नाम के साथ ‘ जी ’ लगाया जाता है जो आदर का सूचक है।  

 

आरएसएस में पिछले कुछ सालों से सामाजिक समरसता का एक पूरा विभाग बनाया गया है जो समाज में हाशिये पर खड़े लोगों के लिए गतिविधियों संचालित करने और समाज को उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए प्रेरित करता है। संघ के सहसरकार्यवाह के. भागय्या सामाजिक समरसता के विषय पर संगठन की ओर से काम-काज देख रहे हैं। फिलहाल संघ की लगभग 60 हजार दैनिक शाखाओं पर आने वाले सभी स्वयंसेवकों को स्पष्ट निर्देश हैं कि शाखा स्थल के आस-पास की मलिन बस्तियों में रहने वाले परिवारों के साथ सतत संपर्क बनाए रखना है। सभी प्रमुख त्योहारों पर संघ के स्वयंसेवक इन मलिन बस्तियों में जाते हैं और उनके साथ मिलकर भोजन करते हैं व त्योहार मनाते हैं। इसके अलावा शिक्षा , स्वास्थ्य , नागरिक सुविधाओं के लिए संघ से प्रेरित कई संगठन जिनमें प्रमुख रूप से सेवा भारती , वनवासी कल्याण आश्रम , विद्या भारती , आरोग्य भारती , संस्कार भारती आदि शामिल हैं , इन मलिन बस्तियों में साल भर सक्रिय रहते हैं। वे उन्हें इस बात का अहसास करवाते हैं कि हम सभी एक ही परिवार , एक ही समाज का हिस्सा हैं। बिना किसी शोर-शराबे , बिना किसी कटुता के , समाज के पिछड़े तबके को सबल बनाने की यह प्रक्रिया संघ के माध्यम से देश की लाखों बस्तियों में कुछ सालों से नहीं बल्कि कई दशकों से चल रही है।  

 

पर दलितों को मात्र एक राजनीतिक वोट बैंक के नजरिए से देखने वाले उनके स्वयंभू पैरोकार इस प्रक्रिया को नहीं समझ पाएंगे। उन्हें शायद इस बात की हैरानी होती होगी कि भला बिना किसी राजनीतिक लाभ अथवा मैगसेसे पुरस्कार के लालच के क्यों कोई सालों-साल दलितों और वंचितों के बीच काम करेगा ? बिना किसी स्वार्थ के समाज हित में काम करने की प्रवृत्ति आज के जमाने में सामान्य समाज में विलुप्त प्राय है। इसलिए यह समझा जा सकता है कि क्यो संघ के दलित उत्थान के प्रयासों को उसके विरोधी पचा नहीं पाते हैं।  

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने सामाजिक समरसता के विषय को 1970 के दशक में राष्ट्रव्यापी स्तर पर उठाया। इस संदर्भ में पूना में 8 मई 1974 को वसंत व्याख्यानमाला के अंतर्गत उन्होंने बड़ा दिलचस्प व्यख्यान दिया जिसका विषय ही ‘ सामाजिक समरसता और हिंदुत्व ’ था। दलितों व वंचितों के बारे में संघ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए बालासाहब ने इस व्याख्यान में कहा , ‘ संघ के संस्थापाक आद्य सरसंघचालक डॉक्टर हेडगेवार के साथ काम करने का सौभाग्य मुझे मिला है। वे कहा करते थे , ‘ हमें न तो अस्पृश्यता माननी है और न उसका पालन करना है। ’ संघ की शाखाओं और कार्यक्रमों की रचना भी उन्होंने इसी आधार पर की। उन दिनों भी कुछ और ढंग से सोचने वाले लोग थे। किंतु डॉक्टर साहब को विश्वास था कि आज नहीं तो कल , वह अपने विचारों से सहमत होंगे ही। अत: उन्होंने न तो इसका ढोल पीटा , न किसी से झगड़ा किया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि दूसरा व्याक्ति भी सत्प्रवृत्त है। कुछ आदतों के कारण भले ही वह संकोच करता हो किंतु यदि उसे समय दिया गया तो वह भी अपनी भूल निश्चित सुधार लेगा।  

 

इसी व्याख्यान में बालासाहब कहते हैं , ‘ समाज के अन्य विचारवान , प्रबुद्ध लोगों पर भी बड़ा दायित्व है। उन्हें ऐसे मार्ग सुझाने चाहिए कि जिनसे काम तो बनेगा किंतु समाज में कुटुता उत्पन्न नहीं होगी। ‘ उपायं चिन्तयन् प्राज्ञ: अपायमपि चिन्तयेत् ’ अर्थात समाज में सौहार्द , सामंजस्य और परस्पर सहयोग का वातावरण स्थापित करने के लिए हमें समानता चाहिए। इस बात को भूलकर अथवा इसे न समझते हुए जो लोग बोलेंगे , लिखेंगे और आचरण करेंगे , वे निश्चय ही अपने उद्देश्यों को बाधा पहुंचाएंगे।