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‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियाँ 1974-75 के दौरान देश की गली-गली में गूंजतीं थीं. पूरा देश नयी ऊर्जा से ओतप्रोत था. उन दिनों श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में देश में कोंग्रेस की सरकार थी. सरकार की लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के कारनामों की चर्चा घर-घर होती थी. तब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक परिवर्तन की लहर उठ खड़ी हुई. जेपी इसे सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि समाज परिवर्तन की लड़ाई कहते थे. आन्दोलन का नाम ही संपूर्ण क्रांति आंदोलन था. उन्होंने आवाज़ लगाई थी. ‘संपूर्ण क्रांति का नारा है, भावी इतिहास हमारा है’. इस आन्दोलन की पहली पंक्ति के नेता थे लालू यादव, शरद यादव, अरुण जेटली, सुशील मोदी आदि. इस आन्दोलन की परिणति 1977 में श्रीमती गांधी की करारी हार से हुई. इसके बाद देश में जनता पार्टी की सरकार बनी.
जेपी का ये आन्दोलन पैदा हुआ था दिसम्बर 1973 में गुजरात के एक कॉलेज में मेस की फीस बढ़ाने से. छात्रों ने पूरे गुजरात में भ्रष्टाचार और महंगाई के विरोध में आन्दोलन आरंभ कर दिया. महंगाई के खिलाफ अहमदाबाद के एक कॉलेज से शुरू हुई ये लड़ाई ‘नव निर्माण आन्दोलन’ के नाम से प्रख्यात हुई. नव निर्माण आन्दोलन के बाद गुजरात की चिमन भाई पटेल की कोंग्रेस सरकार को हटना पडा था.
इसी तरह नब्बे के दशक में एक बार फिर बोफोर्स घोटाले के खिलाफ वीपी सिंह के नेतृत्व में देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक हवा बनी और राजीव गांधी की सरकार चुनाव हार गई. वीपी सिंह जनता दल सरकार के प्रधानमंत्री बन गए. हर बार इन आंदोलनों में जनता ने भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बनाया और शासन के खिलाफ जनता खड़ी हो गई. इन सारे आंदोलनों में सिर्फ़ सत्ता बदलने की बात नहीं हुई बल्कि कहा गया कि समाज परिवर्तन करना है. लेकिन ये सभी आन्दोलन मूलतः नेतृत्व परिवर्तन के सूत्रधार बनकर रह गए. और जो नया नेतृत्व उभरा वह भी कोई नयी बात नहीं ला सका. लालू यादव और वीपी सिंह इसके उदाहरण हैं. लालू ने भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान स्थापित किये तो वीपी सिंह ने समाज को जातिगत आधार पर बांटकर नयी दीवारें खड़ी करने का काम किया.
एक तरह से जब भ्रष्टाचार के खिलाफ पैदा हुए ये आन्दोलन जब सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन के औज़ार बन गए और सत्ता के चरित्र में कोई मूलभूत बदलाव नहीं हुआ तो सामजिक और राजनीतिक तौर पर इन्होने भ्रष्टाचार को एक अनकही स्वीकृति दिला दी. भ्रष्टाचारी नेताओं, अफसरों और व्यापारियों की तिकड़ी को एक तरह की सामाजिक वैधता और लाइसेंस दे दिया. मानो वो कह रह हों कि ‘हम नहीं कहते थे कि भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता’. इस लाइसेंस के कारण ही यूपीए-२ का भ्रष्टाचार सारी सीमाएं और मर्यादा लांघ गया है. इसी से आज फिर देश भ्रष्टाचार पर उद्वेलित है और उसमे एक गहरा गुस्सा है.
भ्रष्टाचार आज एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा है. अन्ना का भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन और पिछले दो साल के दौरान उसे मिला अभूतपूर्व जनसमर्थन हमें उन पिछले आंदोलनों की ही याद तो दिलाता ही है उनसे सबक लेने की भी आज बहुत ज़रूरत है. अन्ना के आन्दोलन से पैदा हुई आम आदमी पार्टी यानि “#आप” इसी जनाक्रोश को भुना रही है. मगर ये पार्टी भी बस यही कहती हुई दिखाई दे रही है कि ‘तुम हमें सत्ता दे दो हम सब ठीक कर देंगे’. उसकी नज़र भी दिल्ली की गद्दी और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर दिखाई देती है. किसी भी बुनियादी बदलाव की और कोई ठोस नीति या कार्यक्रम कहीं भी नज़र नहीं आता. अन्ना की उस सोच से भी वो परे हो गई है कि समाज में गहरे बदलावों के लिए कुछ लोंगों को सत्ता से बाहर रहकर सत्ता के चरित्र को बदलना होगा.
देखा जाए तो मूल रूप से भ्रष्टाचार तीन कारणों से पैदा होता है. 1) हमारी खर्चीली चुनाव प्रणाली, 2) अफसरों और नेताओं के पास असीमित अधिकार और 3) सस्ता और शीघ्र न्याय देने में हमारे वयवस्था की असफलता. अफ़सोस है कि इन तीनो बिंदुओं पर कोई गंभीर बहस नहीं हो रही. देश ने चुनाव सुधार के लिए दिनेश गोस्वामी समिति बनाई थी. उसके बाद इन्द्रजीत गुप्ता समिति ने भी चुनाव सुधार के उपाय सुझाये थे. ये दोनों रिपोर्ट बक्से में बंद क्यों हैं? #अरविन्द केजरीवाल क्यों नही इन्हें लागू करने की माँग करते हुए धरना दे रहे ? क्यों वे भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार नहीं कर रहे? क्या उनका मकसद भी भ्रष्टाचार विरोधी नाव पर सवार होकर सत्ता की नदी में डुबकियाँ लगाना ही है? याद रहे कि भ्रष्टाचार विरोध जब जब राजनैतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए सिर्फ़ एक नारे के तौर पर इस्तेमाल हुआ है तब तब उसने इसे एक स्वीकार्यता और वैधता प्रदान की है. इससे भ्रष्टाचारियों के हौंसले और बढे हैं और हर बार उन्हें खुले आम जनता को लूटने का एक और लाइसेंस मिल गया है.

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है